पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/६९

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( ५५ ) घनकपूर घनमेघ अरु, नागराज गज शेषु । पयाराशि कहि सिधुसा, अरु क्षिति क्षीरहि लेषु ॥३॥ 'धन' का अर्थ 'कपूर' और 'बादल' होता है। कपूर से श्वेत और बादल से काला रंग मानना चाहिए । 'नागराज' के 'हाथी' और 'शेष' दो अर्थ होते है । 'हाथी' से कालारग और 'शेष' से श्वेत रग समझना चाहिए। इसी तरह 'पयोराशि' के 'समुद्र' और 'दुग्ध समूह' दोनो अर्थों में से 'समुद्र' का काला और 'दूध' का श्वेत रग माना जायगा। राहु सिह सिहीजभनि, हरि बलभ्रद अनन्त । अर्जुन कहिये श्वेतसों, अरु पारथ बलवन्त ॥४०॥ 'सिंहीज' शब्द के अर्थ 'राहु' और 'सिंह' है। पहले का रग काला और दूसरे का श्वेत समझा जाता है। 'अनन्त' शब्द के दो अर्थ 'श्रीकृष्ण' और 'बलराम' मे से श्रीकृष्ण का अर्थ काला और 'बलराम' का श्वेत समझना चाहिए। 'अर्जुन' शब्द से श्वेन रग माना जायगा और 'पार्थ' से 'काला'। हरिगजसुरगज समुभिये, फिर हरि गजगज जानि । कोकिल सों कलकण्ठकहि, अरु कलहंस बखानि ॥४१॥ 'हरिगज' शब्द के दो अर्थ है। जब उसका अर्थ इन्द्र का हाथी- ऐरावत होगा तब उसका रग श्वेत मानना चाहिए और जब 'विष्णु' का हाथी, जिसे उन्होने बचाया था अर्थ होगा, तब उसका रंग काला समझना चाहिए। इसी भाँति 'कलकठ' से 'कोयल' और 'कलहंस' दो अर्थ निकलते हैं। कोयल काली मानी जायगी और 'कलहंस' श्वेत। कृष्णनदीवरशब्द सों, गंगासिधु बखानि । नीरद निकसे दन्तको, अरुज नीरको दानि ॥४२॥