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कोड स्वराज

नोटिस” मुद्रांकन कर दिया था। मैंने संयुक्त राज्य अमरीका जिला के मुख्य न्यायाधीशों को एक गुस्ताखी भरा पत्र भेजा था, लेकिन फिर भी उनका ध्यान इस तरफ नहीं गया।

यूएस सीनेट ने इस नोटिस को गंभीरता से लिया और उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यायिक सम्मेलन को, तीखे शब्दों में लिखा एक पत्र भेजा। कोर्ट ने, अपनी गोपनीयता की प्रथा (प्राइवेसी प्रेक्टिसेज़) में कुछ हल्के बदलाव किए, लेकिन हाँ, कुछ न्यायधीशों ने इस मामले को गम्भीरता से लिया, जिसका श्रेय उन्हीं को जाता है। हालांकि इससे हमें कुछ भी लाभ नहीं हुआ। करमुक्त अभिगमन (फ्री-एक्सेस) पायलट प्रयोग निलम्बित रहा। अदालतों ने, उनके केसों के फाइल देखने के भाव भी बढ़ा दिए।

एफ.बी.आई. ने आरोन के घर पर निगरानी रक्खी और उससे बात करने की कोशिश की लेकिन उसने बात करने से इंकार कर दिया। बाद में एफ.बी.आई. ने, अदालतों को कहा कि हमने कुछ गलत नहीं किया है। इसके बाद, न्यूयॉर्क टाइम्स में लेख छपने के बाद, न्यायालय ने एफ.बी.आई को बुलाया और इस मामले पर दुबारा नजर डालने को कहा। फिर भी कुछ नहीं मिला, और एफ.बी.आई ने न्यायालयों को इस मामले को यहीं पर छोड़ देने की गुजारिश की।

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यह बात तब की थी जब से मैंने सविनय अवज्ञा (सिविल रेसिस्टेंश) का गम्भीरता से अध्ययन करना शुरु किया था। मुझे ज्ञात था कि हम उन खतरों का समाना नहीं कर रहे थे जिन खतरो का गांधीजी और मार्टिन लूथर किंग ने सामना किया था। मुझे किसी भी विधि अधिकारी या सतर्कता समिति के सदस्य से खतरा नहीं था कि वे मुझे शारीरिक नुकसान पहुचाएंगे। विधि साहित्य को एक्सेस करना, सामाजिक न्याय पाने के लड़ाई की तुलना में, एक छोटा सा संघर्ष था। यह जनता के लिए आजादी की लड़ाई लड़ने की तरह नहीं था।

लेकिन हमारा प्रयास, सिस्टम की कार्यशैली को बदलना था, और हम यह जानते थे कि हम उन लोगों से बहुत कुछ सीख सकते थे, जो हम से पहले विभिन्न संघर्षों से गुजर चुके हैं। साथ ही, मैं यह जानना चाहता था कि समाज में प्रभावकारी बदलावों को कैसे अमल में लाया जा सकता है। अपने सिर को दीवार पर मारने से, या पवन चक्की को झुकाने से कुछ नहीं होगा। मैं इस बारे में और जानना चाहता था कि पहले ऐसे बदलाव कैसे लाये गये थे। मैं यह भी जानना चाहता था कि हम अपनी वर्तमान की शिकायतों में न उलझ कर, कैसे आने वाले समय में बदलाव ला सकते हैं।

मेरा यह अध्ययन, वर्ष 2011 से और भी अधिक गहन होता चला गया। मैं अब केस लॉ पर काम नहीं कर रहा था, और कानून द्वारा अपेक्षित तकनीकी मानकों पर ध्यान केंद्रित करना शुरु कर दिया था। प्राइवेट पार्टियाँ सोचती थी कि इन कानूनों पर उनका ही स्वामित्व है। वे सोचती थी कि इसके चलते उनकी तनख्वाह दाव पर है। वे कड़ा संघर्ष करने को तैयार थीं। मुझ पर कभी कोई मुकदमा नहीं चला, लेकिन मुझे पता था कि कुछ गैर-लाभकारी स्टेंडर्ड निकायों को इसकी काफी चिंता थी और वे किसी भी कीमत पर यह बदलाव चाहते थे।

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