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कोड स्वराज

सरकारी कर्तव्यों के दौरान लिखे गये पत्रिकाओं के लेख थे, जिन्हें अवैध रूप से प्रकाशकों द्वारा पैसे की दीवार (पे-वाल) के पीछे छिपाया गया था।

मेरी कार्यवाही की मूल योजना अमेरिकी बार एसोसिएसन में मेरे निष्कर्षों पर होने वाले वोटों से उत्पन्न समस्या का विश्लेषण करना था। यह देखना था कि एसोसिएसन मुझे वोट 'हाँ' में। देती है या 'ना' में। फिर उसके बाद उस सूचना को प्रमाणित मेल द्वारा कई दर्जन प्रकाशकों और एजेंसियों को भेजी जानी थी। इन पत्रों द्वारा प्रकाशकों को नोटिस दिया जाना था कि उन पर कुछ सवाल उठे हैं और उन्हें 60 दिनों के अंदर अपनी प्रतिक्रिया देनी है।

मेरे दिमाग में एक ही सवाल था कि “फिर क्या होगा”? जब मैं पब्लिक डोमेन के काम पर कॉपीराइट के अनुचित दावों के बारे में पत्र भेजता हूँ, तो मैं इसे प्रकाशित करने की अनुमति नहीं मांगता हूँ। यदि कोई काम पब्लिक डोमेन में है, तो मुझे किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। मैं इस बात को भी स्पष्ट कर देता हूँ कि मेरे पास ऐसे काम की एक कॉपी भी है जिस के बारे में यह प्रश्न उठा रहा हूँ, अन्यथा यह केवल एक सैद्धांतिक मुद्दा है। मैंने प्रतिक्रियाएं मांगी, लेकिन मुझे नाममात्र प्रतिक्रियाएं ही मिली। इस स्थिति में प्रश्न यह था कि क्या इस लेख को पोस्ट किया जाना चाहिए?

मुझे स्की-हब(Sci-Hub) के एलेक्सजांड्रा एल्बाक्यान और जेएसटीओआर (JSTOR) के एरॉन स्वाट्र्ज के अनुभवों की जानकारी है कि जब प्रकाशकों को उनके वित्तीय हितों पर खतरा नजर आता है, तो वे कितने क्रर हो सकते हैं। मुझे नहीं लगता है कि यदि मैं सरकार के कामों के बारे में वैध तरीके से बात करूंगा, तो प्रकाशक मेरी बात को जरा भी सुनेंगे। वे वही करते हैं, जो मानकों के लोगों ने किया है और वे जम कर झगड़ने के लिये खड़े होते हैं। मैं निश्चित रूप से उस नोटिस को प्रकाशकों को भेजने जा रहा हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उन्होंने सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग किया है, लेकिन मैं ऐसा करने के लिए किसी दूसरे रास्ते की तलाश कर रहा हूँ, जो कम रुखड़ा हो और जो मुझे मेरे लक्ष्यों तक पहुंचाए।

भारत में भी ऐसी ही स्थिति है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉपी करने की दुकान वह रास्ता हो सकता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में एक छोटा और निजी कॉपी करने की दुकान थी। प्रोफेसर वहां कुछ पत्रिकाओं के लेखों की सूची लाते हैं। दुकानदार पुस्तकालय में जाकर उन लेखों को लाकर उनकी प्रतिलिपियां बनाते है, और फिर उन प्रतिलिपियों को एक साथ जोड़ कर विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम पुस्तिका तैयार करते हैं। वे उस पाठ्यक्रम पुस्तिका को मामूली दरों पर बेचते हैं। रामेश्वरी फोटोकॉपी शॉप के खिलाफ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस और टेलर एंड फ्रांसिस ने मुकदमा दायर किया था। दुकान पर सशस्त्र पुलिस बल ने छापा मारा था। दुकान के मालिक ने ‘द वायर' को बताया कि “यह शर्मनाक था - मैं खुद को गुनहगार महसूस कर रहा था।”

यह मुकदमा दिल्ली के उच्च न्यायालय में गया। भारत के एक प्रमुख बौद्धिक सम्पत्ति के विद्वान और एक समर्पित सार्वजनिक कार्यकर्ता, मेरे मित्र शमनाद बशीर ने छात्रों और शिक्षाविदों की सोसाइटी की ओर से हस्तक्षेप किया।

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