पृष्ठ:कोड स्वराज.pdf/५३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।


भारत और अमेरिका में ज्ञान तक सार्वभौमिक पहुँच, कार्ल मालामुद की टिप्पणियां

जून, 2017, द इंटरनेट आर्काइव, सैन फ्रांसिस्को

धन्यवाद सैम। मुझे खुशी है कि मैं, सैम के साथ अक्टूबर में उस समय जुड़ा जब वे भारत में जगह जगह पर बुद्धिउत्तेजक (brainstorming) भाषण देने के दौरे पर थे। हमने गांधी जी के जन्मदिन पर साबरमती आश्रम में व्याख्यान दिये। इंस्टिच्यूशन ऑफ इंजीनियर्स में, मायो बॉयज कॉलेज, और राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय में भी भाषण दिए। वे जहाँ भी गए वहाँ उनके प्रशंसकों की भीड़ थी। गांधी आश्रम में जब हम कार से बाहर निकले तो लगभग 100 लोगों ने सेल्फी लेने के लिए उन्हें घेर लिया था।

वे पिछले 50 वर्षों से भारत सरकार को अपना योगदान दे रहे हैं, जिसमें सभी गांवों तक टेलिफोन पहुँचाने से लेकर, हाल ही में प्रधानमंत्री को फूड बैंक बनाने की, और अन्य कई अन्य चीजों की सलाह देना भी शामिल है। आज की रात हमें अपना समय देने के लिये आपको शुक्रिया।

मैं, अपना समापन विचार देने से पहले उन लोगों को धन्यवाद देना चाहूँगा जिनके प्रयासों से और जिनके कन्धों पर खड़े होकर हमलोग यहां तक पहुंचे हैं। डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया की स्थापना, ‘कारनेगी मेलन विश्वविद्यालय के और मिलियन पुस्तक परियोजना (Million Books Project) के अग्रदूत प्रोफेसर राज रेड्डी और डीन ग्लोरिया सेट, क्लेयर (Dean Gloria St. Clair) के प्रयासों के बिना संभव नहीं था।

भारत में डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया परियोजना के अध्यक्ष प्रतिष्ठित कंप्यूटर वैज्ञानिक प्रोफेसर नारायणस्वामी बालाकृष्णन हैं। डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया अब भारत सरकार की परियोजना बन चुकी है और देशभर में इसके 25 स्कैन केंद्र हैं। यह एक बड़ा उपक्रम है।

लाइब्रेरी में स्कैन की गई 5,50,000 पुस्तकें हैं, और इंटरनेट आर्काइव में 4,00,000 से अधिक स्पिनिंग उपलब्ध हैं। हम इस परियोजना से जुड़ कर काफी प्रसन्न हैं।

यदि हम भारतीय भाषाओं की बात करें तो इस संग्रह को उत्कृष्ट माना जा सकता है। इसमें 45,000 से अधिक पुस्तकें हिंदी में, 33,000 संस्कृत में, 30,000 बंगला में, और अन्य कई भाषाओं में है। इसमें कुल 50 विभिन्न भाषाओं की पुस्तकें मौजूद हैं।

जब इंटरनेट आर्काइव पर पुस्तकों को डाला जाता है, तो वे पी.डी.एफ फाइलों के अलावा ओ.सी.आर के माध्यम से भी गुजारा होता है।

साथ ही इन पुस्तकों को ऐसे प्रारूपों में बदला जाता है, जिससे पाठक अपने ई-रिडर, किंडल और टैबलेट पर भी इसे पढ़ सके। इस तरह उन्नत तकनीक का प्रयोग करके वे इस

45