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कोड स्वराज

भारत की यही विशेषता है। यहां कई त्योहार और उत्सव मनाए जाते हैं। लेकिन आज मैं, भारत की ओर देखता हूँ तो मुझे कई बार चिंताएं घेर लेती हैं।

जब लोग सूचनाओं को पहरे में सीमित रखना चाहते हैं, जब लोग सोशल मीडिया पर झूठ को फैलाते हैं, किसी की स्वतंत्रता पर प्रहार करते हैं, इससे बुरा असर पड़ता है। ये सभी के जीवन से जुड़े मामले हैं जहाँ आपकी जरुरत है। सभी के हित के लिए आपको कम से कम साइबरस्पेस में तो यह विश्वास बनाकर रखना ही होगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रोग्राम एक क्षेत्रविशेष का है, या ब्राह्मण या हिंदू या मुस्लिम का है, इसमें कोई अस्पृश्यता या विभेद नहीं करना चाहिए।

हम हर प्रकार से समावेशी हैं। सचनाओं पर सभी का अधिकार है। आज भारत में, आजकल जिस तरह की परिचर्चाएं चल रही वे निम्न स्तर की है। हमें सच में भारत में संवाद के स्तर को ऊपर उठाने की जरूरत है।

मैं, आजकल एक किताब लिख रहा हूँ। कुछ साल पहले मैंने अपने जीवन पर एक किताब लिखी थी। मैंने वह किताब अपनी पोती के लिए लिखी थी, जो अभी सिर्फ 6 साल की है। और सैन फ्रेन्सिस्को में रहती है। जो एक दिन बड़ी होगी और पूछेगी, “यह बूढ़ा व्यक्ति कौन है जो 100 साल या 75 साल पहले अमरीका आया था?”

और उसके पिता, जिसका जन्म और जिसकी परवरिश संयुक्त राज्य अमरीका में हुई, जो कुछ भी उसे कहेंगे वह बिलकुल ही अलग होगा, क्योंकि उसके पिता नहीं जानते है कि मैंने किस तरह की गरीबी देखी है। वह यह भी नहीं समझ सकता कि मेरा जन्म भारत के छोटे दिवासी गांव में हुआ था, जहां उसकी मां ने अपने घर पर ही अपने 8 बच्चों को जन्म दिया। उस समय न कोई डॉक्टर, न नर्स, न हॉस्पिटल या फॉर्मेसी, कुछ भी नहीं था। न कोई स्कल था। अगर मैं उनसे यह बताऊँ भी तो, वे मेरा विश्वास नहीं करेंगे।

यह वास्तविकता और नहीं रह सकती। इसी भारत को हमें बदलना है। यदि हम 40 करोड़ गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को, उनकी गरीबी से मुक्त कराने के लिए तकनीकी का उपयोग नहीं करते, तो हमने अपना काम नहीं किया।

हम ऐसा भारत नहीं चाहते हैं, जहाँ कई अरबपति हों। यदि वे हैं, तो वे और भी शक्तिशाली होंगे। मैं उनके विरुद्ध नहीं हूँ। लेकिन मैं भारत में हर चीज बदलने के लिए तकनीकी का उपयोग करना चाहता हूँ, जो सिर्फ ज्ञान से ही संभव है।

सिर्फ आप जैसे लोग ही यह कर सकते हैं, जो केवल खुलेपन/उदारता से ही हो सकता है। मेरे अनुसार सूचना से खुलापन आता है, पहुँच बढ़ती है, दायित्व, नेटवर्क, लोकतांत्रीकरण, विकेंद्रीकरण आता है। ये सभी बातें गांधीवाद पर आधारित हैं।

यदि आज गांधीजी होते, तो वे आप से मिलकर बहुत खुश होते। मैं अहमदाबाद में परसों एक व्याख्यान देने जा रहा हूँ। दरअसल कार्ल और मैं पिछले 2 अक्टूबर को साबरमती आश्रम में थे और हमने, इस सूचना और कनेक्टिविटी के युग में, गांधीजी के विचारों पर

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