६२ पृथ्वीराज रासो का निर्माण-काल 'रास' नामक पुस्तक में विस्तार से लिखा हुआ है ।"* इन दोनों लेखों से निश्चित है कि पृथ्वीराजरासो वि० सं० १५१७ और १७३२ के बीच किसी समय में बना होगा । वि० सं० १६४२ की पृथ्वीराजरासो की सबसे पुरानी हस्तलिखित प्रति मिली है, इस लिये उसका वि० सं० १५१७ और १६ : २ के बीच अर्थात् २६०० के आसपास बनना अनुमान किया जा सकता है । पृथ्वीराजरासो की भाषा , पृथ्वीराजरासो की भाषा विक्रम की तेरहवीं शताब्दी की नहीं, किंतु वि० सं० १६०० के आसपास की है । इमचंद्र के 'प्राकृत- व्याकरण' में अपभ्रंश भाषा के छंदोबद्ध उदाहरणों, सोमप्रभ के 'कुमारपाल प्रतिबोध', मेरुतुंग की 'प्रबंधचितामणि' तथा 'प्राकृत- पिंगल' में दिए हुए रणथंभोर के अंतिम चौहान राजा हम्मीर के प्रशंसात्मक पद्य, तथा वि० सं० १५८२ के बोटू सूजा रचित 'जैतसी राव को छंद' नामक ग्रंथ में मिलनेवाले छंदों को भाषा से पृथ्वी- राजरासो की भाषा का मिलान किया जाय, तो बहुत बड़ा अंतर मालूम होता है । पठित चारण और भाट लोग अब भी कविता बनाते हैं, उसमें वोररस की कविता बहुधा डिंगल भाषा में करते हैं और दूसरी कविता साधारण भाषा में । डिंगल भाषा की कविता में व्याकरण की ठीक व्यवस्था नहीं होती और शब्दों के रूप तथा विभक्तियों के चिह्न कुछ पुराने ढंग के होते हैं । एक ही ग्रंथ में
- ततः समरसिंहाव्यः पृथ्वीराजस्य भूपतेः ।
पृधाख्याया भगिन्यास्तु पतिरित्यतिहादेव ॥ २४ ॥ गोरीसाहिबदीनेन गज्जनीशेन संगर । कुतोऽखर्च गर्वस्य महासामंतशभिः || २५ || दिल्लीश्वरस्य चोहाननाथस्यास्य सहायकृत : स द्वादशसहस्रं स्ववीराणासहितो रणे ॥ २६ ॥ बध्वा गोरीपति दैवात् स्वर्यातः सूर्यबि अभित् । भाषांरासापुस्तकस्य युद्धस्योक्तोस्ति विस्तरः ॥ २७ ॥ राजप्रशस्ति महाकाव्य; सर्ग ३ |