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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१०६

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रायबहादुर श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा ६३ भिन्न भिन्न प्रकार की कविता देखनी हो, तो विक्रम संवत् १८७८ में चढ़ा किशन के बनाए हुए 'भीमविलास' और विक्रम की बीसवीं सदी में बने हुए मिश्रण सूर्यमल के बृहद्ग्रंथ 'वंशभास्कर' को देखना चाहिए। राजस्थानी भाषा की कविता में पहले फारसी- शब्दों का प्रयोग नहीं होता था, पीछे से कुछ कुछ होने लगा । पृथ्वीराजरासो में प्रति सैकड़ा दस फारसी शब्द पाए जाते हैं, जो उसकी प्राचीनता सिद्ध नहीं करते । आधुनिक लेखक भी स्वीकार करते हैं कि 'भाषा' की कसौटी पर यदि ग्रंथ ( पृथ्वी- राजरासो) को कसते हैं तो और भी निराश होना पड़ता है, क्योंकि वह बिल्कुल बेठिकाने है-उसमें व्याकरण आदि की कोई व्यवस्था नहीं है । दोहों की और कुछ कुछ कवित्तों (छप्पयों ) की भाषा तो ठिकाने की है, पर त्रोटक आदि छोटे छंदों में तो कहीं कहीं अनुस्वारांत शब्दों की ऐसी मनमानी भरमार है जैसे किसी ने संस्कृत - प्राकृत की नकल की हो : कहीं कहीं तो भाषा आधुनिक सांचे में ढली सी दिखाई पड़ती है, क्रियाएँ नए रूपों में मिलती हैं । पर साथ ही कहीं कहीं भाषा अपने असली प्राचीन साहित्यिक रूप में भी पाई जाती है, जिसमें प्राकृत और अपभ्रंश ' शब्दों के साथ साथ शब्दों के रूप और विभक्तियों के चिह्न पुराने ढंग के हैं । इस दशा में भादों के इस वारजाल के बीच कहाँ पर कितना अंश असली है, इसका निर्णय असंभव होने के कारण यह ग्रंथ न तो भाषा के इतिहास के और न साहित्य के इतिहास के जिज्ञासुओं के काम का रह गया है ।

भाषा की दृष्टि से भी रासो वि० सं० १६०० से पूर्व का सिद्ध नहीं हो सकता । पृथ्वीराजरासो का परिमाण " भाषा साहित्य के आधुनिक इतिहास-लेखक जब पृथ्वीराजरासो की घटनाएँ अशुद्ध पाते हैं तब यह कहते हैं कि 'मूल पृथ्वीराज-

  • नागरीप्रचारिणी पत्रिका ( नवीन संस्करण ) भाग ६, ५० ३३ ३४ ।