६५ पृथ्वीराज रासो का निर्माण-काल आज की डिंगल में भी ऐसा आभास मिलता है, जिसका बीसवीं सदी में बना हुआ 'वंशभास्कर' प्रत्यक्ष उदाहरण है । रासो की भाषा में फारसी शब्दों की बहुलता भी उसके प्राचीन होने में बाधक है । वस्तुतः पृथ्वीराजरासो वि० सं० १६०० के आस पास लिखा गया। वि० सं० १५१७ की प्रशस्ति में रासो की घटनाओं का उल्लेख नहीं है और रासो की सब से पुरानी प्रति वि० सं० १६४२ की मिली है, जिसके बाद यह ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हो गया, यहाँ तक कि वि० सं० १७३२ की राजप्रशस्ति में रासो का स्पष्ट उल्लेख है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि पहले पृथ्वीराजरासो का मूल ग्रंथ उसके वर्तमान परिमाग से बहुत छोटा था, परंतु पीछे से बढ़ाया गया है, क्योंकि आज से १८५ वर्ष पूर्व उसी के वंशज कवि जदुनाथ ने उसका १०५००० श्लोकों का होना लिखा है को प्राचीन सिद्ध करने के लिए जो दूसरी युक्तियाँ भी निराधार ही हैं। अनंद विक्रम संवत् की | पृथ्वीराजरासो दी जाती हैं, वे कल्पना तो बहुत व्यर्थ और निर्मूल है, जिसका विस्तृत खंडन नागरीप्रचारिणी पत्रिका में किया जा चुका है। संक्षेप से इस लेख में भी उसकी जॉच की गई है। इस ग्रंथ के प्रसिद्धि में आने के कारण राजपूताने के इतिहास में बहुत अशुद्धि हुई । उदयपुर, जोधपुर, जयपुर श्रादि राज्यों की ख्याते के लिखनेवालों ने रासों के संवतों को शुद्ध मानकर वहाँ के कई पुराने राजाओ के संवत् मनमाने झूठे घर दिए। हिंदी भाषा का इतिहास लिखनेवाले जो विद्वान चंदवरदाई को पृथ्वीराज का समकालीन मानते हैं, वे सत्य जाँच की उपेक्षा कर हठधर्मी ही करते हैं। यदि वे निष्पक्ष होकर इसकी पूरी जाँच करें तो उन्हें सष्ट मालूम हो जायगा कि रासो वि० सं० १६०० से पूर्व का बना हुआ नहीं है और न वह ऐतिहासिक ग्रंथ है । ।
पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१०९
दिखावट