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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/११०

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( ४ ) आमेर के कछवाहा और राव पजून तथा राव कील्हण का समय [ लेखक - श्री हरिचरण सिंह चौहान ] बदामा का समय आमेर राज्य की वंशावलियों के आधार पर इसके पिता का नाम राय भानु मिलता है तथा लक्ष्मय राय को चौथी शताब्दी माना जाता है। और दादा का नाम लक्ष्मय राय राजा नल का पोता लिखा है । वंशावलियों में राजा नल का समय ३५० वि० तथा टॉड लाहब के लेखानुसार संवत् ३५१ वि० ठहरता है। लेकिन शिलालेखों के आधार पर बज्रदामा ने संवत् १०३४ वि० में परिहारों का प्रताप मिटाकर ग्वालियर दुर्ग पर अपना अधिकार जमाया था । रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद जी ओझा ने, बज्रदामा का पुत्र मंगलराज और उसके दो पुत्र कीर्ति- राज और सुमित्र लिखकर कीतिराज के वंश में ग्वालियर के कछवाह और सुमित्र के वंश में आमेर अर्थात् जयपुर और अलवर के कछवाह लिखे हैं। शिलालेख में सुमित्र का नाम न होने पर भी, उन्होंने मूता नैमासी की ख्यात के आधार पर सुमित्र को उपरोक्त वज्रदामा के पुत्र मंगलराज का दूसरा पुत्र माना हैं । यद्यपि अन्य वंशावलियां की ही भाँति मूता नैणसी को दी हुई वंशावली भी बड़वा भाटों की वंशावलियों का ही आधार है तथापि शिलालेखों के आधार पर चलनेवाले रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंदजी का नं ग्रोमा जब उसकी प्रमाण मान लिया है तो मानना ही पड़ेगा कि बज्र- दामा के पीछे मंगलराज, सुमित्र, मधुब्रह्म, कहान, देवानीक, ईशा- सिंह, सोढ़देव और दुलहराय हुए । इनका संवत् शिलालेखे में कहीं नहीं मिला, पर वंशावलियों में साढ़देवजी का समय संवत् १०२३ से १०६३ तक मिलता है । जुन कि बज्रामा का संवत् १०३४ में ग्वालियर लेना मिलता है तब उसके वें वंशधर