श्री हरिचरण सिंह चौहान ६८ हमने कछवाहों की ३० वंशावलियाँ इकट्ठी की, उन सबमें ही सोढ़देवजी तथा उनके पुत्र दूलह राय का संवत् १०२३ में दुढार में आना ही मिला है, संवत् ८३३ वाली कोई वंशावली नहीं मिली । कछवाहों को ग्वालियर से निकालनेवाले तेंवर राजा के अंश का लक्ष्मण नामी राजा लिखा है सो भी ठीक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि ग्वालियर के दुर्ग में कछवाहा राजा बज्रदामा का एक लेख वैशाख सुदी १५ संवत् १०३४ का मिल चुका है जो 38 B. भाग ३१ पृष्ठ २८३ में मुद्रित है । शिलालेखों में कछवाहों की वंशावली लक्ष्मण से मिलती है । लक्ष्मण के पुत्र वज्रदामा के विषय में लिखा है कि "गाधिपुर के राजा का प्रताप मिटाकर उसने अपने बाहुबल से गोपाद्रि ( ग्वालियर ) का दुर्ग विजय किया !" इस लेख से लक्ष्मण तँवर नहीं, कछवाहा सिद्ध होता हैं, क्योंकि वह बज्दामा का पिता था । जब २०३४ वि० में कछ- वाहा बज्रदामा द्वारा ग्वालियर का दुर्ग विजय करना शिलालेखां में मिलता है तब २४४ में कछवाहों से छीना जाना मानने के लिये कोई सहमत नहीं हो सकता । १५वीं शताब्दी के आरंभ काल में तेवरों ने सय्यद किलेदार से ग्वालियर छीनकर उस पर अपना अधिकार किया था । शिलालेखों के आधार पर बदामा का पुत्र मंगलराज और उसका कीर्तिराज था जिसका शिलालेख संवत् १०७८ का मिल चुका है । उक्त कीर्तिराज के वंश में क्रमश: मूलदेव, देवपाल, पद्म- पाल, महीपाल, त्रिभुवनपाल, विजयपाल, सुरपाल और अनंगपाल ग्वालियर की गद्दी पर राज्य करते रहे । अनंगपाल संवत् विद्यमानता में युवराज था, १२१२ वि० मे अपने पिता की पीछे सोलंखपाल ग्वालियर का राजा था । ( वि० १२५३ ) में मुसलमानों ने चढ़ाई की। उसके इस पर हिजरी ५८२ एक वर्ष की विकट लड़ाई के पीछे सामग्री चुक जाने पर सोलंखपाल ने ग्वालियर का दुर्ग कुतुबुद्दीन के सुपुर्द कर दिया। इससे विदित होता है कि संवत्
पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/११२
दिखावट