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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१२

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भूमिका किसी देश या जाति की उन्नति के लिये उसक साहित्य का जाति के निर्माण में साहित्य का बहुत बड़ा उन्नति आवश्यक है । भाग होता है, इसमें संदेह नहीं । उन्नत साहित्य जाति में नवीन विचार, नवीन शिक्षा और नवीन साहस उत्पन्न कर उसे प्रगतिशील बना देता है । इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रत्येक जाति की उन्नति के समय उसके साहित्य का प्रकर्ष होता रहा है । अवस्था में था, हिंदी साहित्य की प्रगति और न आज तो हिंदी साहित्य की उन्नति बड़े वेग से हो रही है, परंतु आज से करीब सौ वर्ष पूर्व हिंदी साहित्य की अवस्था अच्छी नहीं थो । यद्यपि उस समय हिंदी का पद्य साहित्य बहुत उन्नत तथापि हिंदी का गद्य साहित्य तो न होने के बराबर था । १६ वीं सदी में गोस्वामी विट्ठलनाथ, गोकुलनाथ, गंगाभाट, हरिराय और जमल आदि ने कुछ गद्य ग्रंथ लिखे परंतु वे बहुधा व्रजभाषा में ही लिखे गए। न तो उनका विशेष प्रचार हुआ बहुत समय तक कोई गद्यलेखक ही हुआ । वर्तमान खड़ी बोली में सबसे पहले सदासुख लाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लूजीलाल और मदल मिश्र ने अठारहवीं शताब्दी के अंत में कुछ ग्रंथ लिखे । इसी लिये अनेक विद्वान् उन्हें वर्तमान हिंदी गद्य साहित्य के जन्मदाता भी कहते हैं। इनमें से लल्लुजीलाल ने प्रेमसागर के अतिरिक्त सिंहासन- बत्तीसी, बैताल पचीसी, शकुंतला, माधोनल, माधवविलास, लतायफ हिंदी और लालचंद्रिका आदि ग्रंथ लिखे । परंतु इनमें से कुछ उर्दू में भी हैं। इसके अतिरिक्त सदासुखलाल ने सुखसागर, इंशा अल्ला खाँ ने रानी केतकी की कहानी और सदल मिश्र ने नासिकेतोपाख्यान ग्रंथ लिखे । वस्तुत: इन्हीं महानुभावों ने हिंदी के गद्य साहित्य की नींव डाली ।