८० पुराने सिक्कों की कुछ बातें. अभिप्राय यह है कि एक कौड़ी का तो कुछ मोल भी होता है । एक कौड़ो से कम माल की फूटी या कानी कौड़ी हुआ करती है । उसके भी मोल का नहीं अर्थात् बिलकुल ही ये काम | कई देशी भाषाओं में घनद्रव्य के लिये 'कौड़ी' शब्द व्यवहार किया जाता है । यथा वह महाजन कौड़ीवाला है अर्थात् खूब धनी है ! हमारे देश में ६०-७० वर्ष पूर्व देहात के लोग शाक, भाजी, फल-मूल आदि कौड़ियों के खरीदा करते थे । २० कौड़ी की भाजी एक ८-१० मनुष्यवाले कुटुंब के लिये बस थी ! देश की उस समय वैसी ही अवस्था थी। आज कल की भाँति शाक पात तक का दुर्भिक्ष न था । कौड़ी के बाद तांबे का पैसा था जो पण या कार्षापण कह- लाता था अनेक विद्वानों का मत है कि पाणि ( 'हाथ ) से 'पण' शब्द निकला है। जिसके बदले में पाणि अर्थात् मुट्ठी भर कौड़ी आा सके, उसका नाम "पण" ( पैसा ) था . Indian पण a handful derived from Pani the hand. Indian q was a handful of cowree shells, tisually reckoned as 80. कर्ष का अर्थ तोल या वजन है और 'आप' का अर्थ 'प्रचलन, व्यवहार' है । कार्षापण का अर्थ वह तौल जो लोगों में प्रचलित था ! ४ कौड़ी का एक गंडा ५ गंडे की (५x४ = २० कौड़ी) एक बोड़ी या काकिणी* ताम्र ४ बोड़ी का ( ४x२० = ८० कौड़ी) एक पण ४ पण का एक टंक ४ टंक का एक कार्ष १४४ ग्रेन ताम्र १४ मेन चाँदी ५६ ग्रेन चाँदी ४ कार्य का एक पत्त
- काकिणी, काकिणिका, काकिनी या काकणि उस ताम्र - मुद्रा का नाम
था जिसके बदले में २० कौड़ियां आती थीं । A sum of money equal to 20 cowries or to a quarter of a Pana पथ । गुसाईंजी महाराज ने अपनी "विनयपत्रिका" के भजन संख्या :४२ में लिखा है- साधन फल श्रुति-सार नाम तत्र भव सरिता कहूँ बेरो । सो पर कर काकिनी लागि सर बेचि होत हठि चेरो ॥