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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१२४

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श्री लोवनप्रसाद पांडेय ८१ बोड़ो का प्रयोग देश के कई भागों में था । उत्कल में यह श्लोक प्रसिद्ध है— तीर्थे धेनुः पथे गोश्च गृहे च पहू बोड़िका "पुराय" और "सुवर्ण" नाम भी रौप्य और स्वर्ण मुद्राओं के लिये प्रचलित थे । धर्म-ग्रंथों में प्रण के 3 4 , 8" 12 भागों का भी उल्लेख है । ये भाग नदियों के पार उतराई के लिये थे । पण दिन भर की मजूरी में दिया जाता था अर्थात् मजदूरों को पेट भर भोजन और एक पण उनकी पूरी मजूरी थी । मालवांतर्गत उज्जैन और सरन में प्राप्त मुद्राओं में कई एक इतनी छोटी छोटी हैं कि वे वजन में चार ग्रेन से ज्यादा नहीं हैं । ऐसी मुद्राओं का मोल बहुत करके दो कौड़ी से ज्याद

न था ।

उन्हें हम गंडा कह सकते हैं ताम्रमुद्राओं का क्रम इस प्रकार माना जा सकता कौड़ी १० २० LAW पय ५ प वजन वजन पह पण नाम रत्तो मेन प ५ € ४० 15 पण अर्धकाकिनी १० १५ २|| बोड़ी या ५० कोड़ो की काकिनी या बोडी एक निधि मानी जाती थी । या बोड़ी २० ३६ ८० १ प‍ अर्धपण ४० ७२ १४४ १० बोड़ो या २०० कौड़ी पण या कार्षापण ८० की एक दोगानी | तक्षशिला आदि स्थानों में ताम्र की जो चतुष्कोण चिह्नांकित मुद्राएँ ( Punch-marked coins) मिला करती हैं वे सत्र 'पा' हैं। काकिनी या बोड़ी नामक मुद्रांश अब एक प्रकार से १ १