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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१३१

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८८ हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रकाशित परिच्छेद लाने के सर्वथा पात्र है; अतः इन महापुरुष के प्रति श्रद्धा भक्ति सं प्रेरित होकर स्मारक ग्रंथ प्रकाशित करना सर्वथा योग्य ही हैं, प्रस्तु । सभा ने भारतवर्ष में हिंदी के प्रचार का खासा प्रयत्न किया. पर हमारी दृष्टि से उसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है हिंदी के गुण- गरिमा प्रदर्शक प्राचीन साहित्य रत्नों का संशोधन तथा प्रकाशन | X x भाषा का सौदर्य तथा वैभव प्राचीन साहित्य से ही ज्ञात हो सकता है। और बिना भाषा का महत्त्व स्थापित किए समाज उसका अनुयायी नहीं हो सकता । नागरी भाषा, नागर समाज सुसंस्कृत, सभ्य तथा उच्च समाज की भाषा थी; यह बात हिंदी के प्राचीनतर इतिहास से भली भाँति ज्ञात हो सकती है। अपभ्रंश संस्कृत के प्राकृत का प्रत्यक्ष स्वरूप प्राचीन हिंदी हैं, और, विक्रम की सातवीं शताब्दी से लगाकर आज तक सर्वत्र उसी भाषा का प्रचार है i मेरे स्वर्गीय मित्र संस्कृत तथा प्राकृत के प्रकांड विद्वान् चंद्रधरजी गुतेरी ने प्राकृत से हिंदी के क्रम विकास पर अच्छा प्रकाश डाला था। ईसा की सातवीं शताब्दा में अवंतिका में पुष्य या पुंड नामक हिंदी का प्रादि-कवि होना कहा जाता है । पर. तत्संबंधी कोई प्रमाण नहीं मिलता। ईसा की नवीं शताब्दी के पूर्व देशी भाषाओं के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रमाण आज तक नहीं प्राप्त हुआ था। पर, नागरी की प्राचीनता की दृष्टि से हाल ही में एक अपूर्व संशोधन हुआ है। गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज का सत्ताई- सवाँ ग्रंथ अपभ्रंश काव्यत्रय हाल ही में प्रकाशित हुआ The | उसके परिशिष्ट में कुवलय कथामाला नामक काव्य के कुछ अवतरण दिए हैं 1 उक्त अपभ्रंश भाषा ग्रंथ चैत्र कृष्णा १४ शाके ७०० (सन् ७७८) को लिखा गया इसकी भाषा प्राकृत है; किंतु प्राकृत के अतिरिक्त अन्यान्य १८ देशी भाषाओं का उस समय अस्तित्व होने का उसमें उल्लेख है । उसमें वर्तमान मध्य भारत तथा मालवे की प्राचीन भाषाओं का उल्लेख भी पाया जाता है, जो हिंदी के प्राचीनतर रूप कहे जा सकते हैं ! यथा- 1