६० 1 हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रकाशित परिच्छेद प्रदेश काल तक प्रचार हो गया ! अब भी पंजाब तथा अफगानिस्तान में उसी महाराष्ट्रीय पंथ महानुभाव उर्फ जयकृष्णी मत के मठ वर्त- मान हैं। महानुभाव पंथ के अनुयायियों ने हिंदी में विपुल रचना की है, यहां तक कि चंद के पूर्व की हिंदी रचनाएँ भी पाई जाती हैं। हिंदुओं के प्राचीन तीर्थ स्थान काशी, गया आदि उत्तरीय भारत में ही स्थित होने के कारण जब कभी महाराष्ट्रीय उत्तरी भारत में तीर्थ- यात्रा को आते तब उन्हें हिंदी का अध्ययन करना आवश्यक था । देवगिरि का महाराष्ट्रीय स्वराज नष्ट हो जाने के कारण मुसलमानी राज की जड़ महाराष्ट्र में जमी, जिससे पारस्परिक विचार विनिमय के उद्देश से हिंदी का वहाँ पर विशेष प्रचार हुआ । श्री शिवाजी छत्रपति के पूर्ववर्त्ती, तत्कालीन तथा परवर्त्ती साधु संतों को स्वधर्म- प्रवार तथा परधर्मियों पर हिंदू धर्म का सिक्का जमाने के निमित्त हिंदी का ही आश्रय लेना पड़ता था । मराठों की फौज में प्रायः पूर्वीय राजदूत तथा मुसलमान आदि जातियों के रंगरूट भरती हुआ करते थे, जिससे उनके द्वारा भी हिंदी प्रचार का कार्य जारी रहा। मुगलों के अंतिम दिनों तक दिल्ली नगर ही भारतीय राज- नीति का केंद्र कहलाता था, जिससे महाराष्ट्रीय राजनीतिज्ञों का ध्यान सर्वदा दिल्ली की ओर लगा रहता था, अत: उन्हें विवश होकर तत्त्रांतीय भाषा का ही ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक हो गया। महाराष्ट्र के क्षत्रिय मराठे प्रायः राजपूताने से ही उस प्रांत में जाकर बसे थे; अतः प्राचीन मराठे तथा उनके वर्तमान वंशज भी अपने को राजपूत कहलाना परम गौरवास्पद समझते हैं तथा येन केन प्रकारेण राज- पूते से अपना संबंध रखने की चेष्टा किया करते हैं । छत्रपति शिवा - जी महाराज ने व्याही स्वराज स्थापित करने का प्रयत्न किया और उनके उत्तराधिकारियों ने उस उद्देश्य सिद्धि के प्रीत्यर्थ उत्तरीय भारत से अपना राजनीतिक संबंध प्रस्थापित किया, त्योंही उत्तर भारतीय हिंदो भाषा से उनका संबंध अधिक हो गया । इस प्रकार कारण-परंपरा से, महाराष्ट्र में हिंदी की जड़ दृढ़ हो गई। महाराष्ट्रीय खाधु,
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