श्री भास्कर रामचंद्र भालेराव ६१ कवि तथा लेखकों ने हिंदी भाषा को अपनी रचना से खुत्र अलंकृत किया । पर हमारे साहित्य का यह परिच्छेद अभी तक अज्ञात' है। महाराष्ट्रीय तथा हिंदी भाषा भाषियों के पारस्परिक संबंध का यह परिणाम हुआ कि भक्तप्रवर नाभाजी ने अपनी भक्तमाल में कई महाराष्ट्रीय संतों का गुणगान किया, गुरु नानक ने अपने ग्रंथ साहब में महाराष्ट्रीय कवि नामदेवजी की कृति को स्थान दिया तथा महाराष्ट्र के प्रायः सभी संतों ने अपनी रचित संत- नामावलियों में उत्तरीय भारत के संतों का गुण गान किया । महाराष्ट्र के आदि- कवि ज्ञानेश्वर महाराज से लगाकर प्रायः सभी कवियों ने हिंदी रचना की और महाराष्ट्र में बसे हुए प्रायः सभी मुसलमान साधु तथा कवियों ने महाराष्ट्रीय भाषा में ग्रंथ रचना की । १८ वीं शताब्दो में महाराष्ट्र का उत्तरीय भारत पर राजनीतिक अधिकार स्थायी हो जाने पर तो मध्य भारत और राजपूताने के कई कवियों ने भी महाराष्ट्र विजेताओ की भाषा सीखकर उस भाषा में रचना की है। महाराष्ट्र में हिंदी प्रचार के कारणों पर प्रकाश डालकर अब हम संक्षेप में चंद-गोरख-विद्यापति-काल से लगाकर आज तक के तत्प्रांतीय हिंदी साहित्य का वर्णन करते हैं । चंद-गोरख-विद्यापति-काल १ - सेामेश्वर - यह चालुक्य वंशीय राजा थे और इनका विरुद 'सर्वज्ञ भूप' था। इनका लिखा हुआ मानसोल्लास अर्थात् अभिलषितार्थ चिंतामणि नामक ग्रंथ उपलब्ध हुआ है । उक्त ग्रंथ में लगभग १५ विषयों का वर्णन किया गया है, जिनमें समाज, भूगोल, सेना, वाद्य, ज्योतिष, छंद, हाथी, घोड़े आदि का वर्णन है । राग रागिनियों के वर्णन में कई देशी भाषाओं के पद्यों के उदाहरण भी दिए गए हैं। लाटी भाषा के जो उदाहरण हैं, वे पूर्वकालिक हिंदी से मिलते जुलते हैं। यथा- नंद गोकुल जायो कान्छ जो गोवी जो पडि हेली से नयणे जो विया घडणा भरमा बिना झाणि हक्कारियां कान्छो भरडा सो
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