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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१५१

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१०८ हिंदी साहित्य के इतिहास के अप्रकाशित परिच्छेद थं १० - दयालनाथ -यं उक्त उल्लिखित देवनाथजी के शिष्य | आपकी बहुत सी हिंदी मराठी कविता पाई जाती हैं। हिंदी पर आपका अच्छा अधिकार था । यथा- जरा ँस हँस वेणु बजाओ जी तुम्हें दुहाई नंद चरण की | जराश लटपट पेंच मुकुट पर छूटे हँसि श्रावत तोरे लटकन की । घूँघट खोल, दरश मोहि दीजे चोट चलाओ। नयना पलकन की । सब बनिता विरदन की मारी, वृत्ति विकल भव छन मन की। देवनाथ प्रभु दयालु तुमही, आस लगी पद सुमिरन की ! इनकी मृत्यु शाके १७५७ में हुई । ११ - नगाजी महाराज, भैरव अवधूत, अनंत गनपत - राव बहिरम और जन पंडित इन्हीं के समकालीन थे । प्रत्येक की हिंदी रचना भी पाई जाती है । १२ - महीपतिनाथ - महात्मा यशवंतराव होलकर के गुरु थे । इन्होंने मध्य भारत तथा राजपुताने में घूमकर धर्म जागृति का अच्छा काम किया था। ग्वालियर में आपका अभी तक मठ वर्तमान है । } मृत्यु शाके १७४५ में हुई। हिंदी रचना का नमूना यह है- धीरे धीरे झूलो जी नंदलाल ॥ वर्षा ऋतु सावन का महीना, गावा राग मल्हार तुम सुकमार कुँवर कन्हैया, ऊँचा कदम की डार || पवन छूटे बिजली चमके उड़त काँग्रे रुमाल | नरहरि महीपति गावं नाचें, सब संग ग्वाल गोपाल || १३- ठाकुरदास बाबा- ये गंगातीरस्थ शिवराजपुर के निवासी थे और पूना जाकर बसे थे । आपका पेशवा के दरबार में बड़ा आदर हुआ । पूना और बंबई में आपके मंदिर अभी तक वर्तमान हैं तथा बंबई का ठाकुरद्वार अभी तक आपके ही नाम से मशहूर हैं। आपकी मृत्यु शाके १७५२ में हुई । आपने मराठी पर भी अच्छा अधिकार प्राप्त कर लिया था । आपकी हिंदी तथा मराठी स्फुट कविता पाई जाती है ।