१९० हिंदी साहित्य के इतिहास के अप्रकाशित परिच्छेद आगटे, देशपांडे, साठे, मायानंद, चैतन्य आदि कई महाराष्ट्रीय सज्जन, अपने पूर्वजों का अनुकरण करके, राष्ट्रभाषा से नेह निभा रहे हैं । महाराष्ट्र के संत कवियों की परंपरा के अंतिम कवि ग्वालियर के सरदार बलवंत राव भव्या शिंदे हुए, जिनकी हिंदी रचना अत्यंत बोजपूर्ण है । आशा है कि भूतकाल की तरह महाराष्ट्रियों की राष्ट्र- भाषा-सेवा की लगन भविष्य में और भी अधिक होगी। हमारा विचार गुजरात के आदि कवि नरसिंह मेहता से लगा- कर आज तक के तत्प्रांतीय गुर्जर साहित्य-संवियों की हिंदी स्फुट पथ तथा ग्रंथ रचना का भी परिचय, इस निबंध के द्वारा कराने का था । उस प्रांत में भी १५ वीं शताब्दो से लगाकर प्रत्येक शताब्दी में बड़े अच्छे हिंदी कवि तथा अंधकार हो गए हैं। लगभग १५० कवियों की स्फुट तथा ग्रंथ रचना हमारे संग्रह में विद्यमान है। पर, यह निबंध विस्तृत हो जाने के कारण, शोक है कि, तत्संबंधी वर्णन नहीं कर सकें । गुजरात तथा महाराष्ट्र की तरह सुदूर प्रदेश मद्रास के गोपाल भट्ट आदि हिंदी कवि, पंजाब के गुरु नानक, गोपी आदि सिक्ख हिंदी कवि महानुभाव, बंगाल के विद्यापति, हिंदी पदमावत ग्रंथ के मँगला अनुवादक, १७ वीं शताब्दी के कवि, श्राश्रयाल, मुसलमान हिंदी सेवी आदि के संबंध में बहुत सी सामग्री हमने जुदाई है । उसके आधार पर हम हिंदी के १२ वीं शताब्दी से राष्ट्रभाषा होने के सिद्धांत को सिद्ध कर सकते हैं
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