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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१५४

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( ७ ) रवींद्रनाथ ठाकुर [ लेखक - श्रीनलिनीमोहन सान्याल, भाषा तत्व-रत्र, एम० ए० ] भूमिका 15, नाना दिकू से विश्व की तथा मानव जीवन की उपलब्धि करने की व्याकुलता ने ही रवींद्रनाथ के कवित्व का उन्मेष किया है ! अपने जीवन के द्वारा जिस संपूर्ण जीवन की ठीक उपलब्धि नहीं होती किंतु जिसका दूर से ही परिचय मिलता है, उसे अतिरिक औत्सुक्य के तीव्र आलोक से देदीप्यमान करने की चेष्टा ही उनकी कविताओं में व्यक्त होती हैं । उनके अंतरतम चित्त में विश्व के लिये विरह-वेदना जाग उठी थी वह अभिसार को जाना चाहते थे, पर रास्ता नहीं जानने थे: मन के आवेग से नाना ओर को दौड़ते थे और नाना भ्रम में पहते थे । इस प्रकार बाधा पाते पाते कवि ने अंत में अपना पथ निकाल लिया । रवींद्रनाथ को आध्यात्मिक साधना ने बाहरी किसी संस्कार का अवलंबन नहीं किया। वह उनके समस्त जीवन के भीतर से उद्भुत हुई है । जीवन की सब विचित्रताओं को परिपूर्ण एक के भीतर पाने की आकांक्षा ही कवि के परिणत जीवन में भी काम कर रही है ! जैसे concert वा एकतान संगीत में नाना वाद्ययंत्र बजते हैं और प्रत्येक सुर अपना अपना काम पूरी तरह करते हुए भी समय संगीत को रूप देने में व्यस्त रहता है और हमें उनकी पृथक पृथक सत्ता की अनुभूति नहीं होती - उसी प्रकार रवींद्रनाथ के जीवन की सब विचित्रताओं में से प्रत्येक ने अपने चरमतम सुर का प्रकाश करते हुए भी ऐक्य की रागिणी में अपने को विसर्जन किया है । इसी लिये उनके काव्य की संखताओं की अपेक्षा सममता की मूर्ति अधिक दृष्ट होती है ! 1 जैसे ज्योतिष्क-