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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१५७

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११४ रवींद्रनाथ ठाकुर " परंतु वह सत्ता स्वतंत्र न होनी चाहिए ! उसे एक ही समय स्वतंत्र तथा मिलित, ससीम तथा असीम होना चाहिए। जिस काव्य से समग्र विश्व - प्रकृति के आनंद का कंकार उठता है, मानव- हृदय में वही चिरंतन आसन पाता है 1 वाल्मीकि का रामायण, होमर का इलियड, कालिदास का मेघदूत, कीट्स की कविताएँ, शेक्सपियर के नाटक, उमर खैयाम की रुवाइयों, देश-काल की संकीर्ण बाधाओं को प्रतिक्रम कर गई हैं। अब देखना चाहिए कि रवींद्रनाथ की कविता इस श्रेणी के अंतर्गत हो सकती है या नहीं । रवींद्रनाथ का वाल्य-जीवन 1 रवींद्रनाथ का जन्म हुआ था सं० १९९८ के वैशाख में । यह धनी जमींदार के लड़के हैं। इनके पितामह द्वारकानाथ ठाकुर ने इंगलैंड की यात्रा की थी। वह प्रिंस द्वारकानाथ कहलाते थे धूमधाम में और अपनी मर्यादा की रक्षा के लिये उन्हें वहाँ अत्य- धिक व्यय करना पड़ा था और ऋण से यह निर्वाह किया गया था । वहीं उनकी मृत्यु हुई थी । महाजनों ने उनकी जमींदारी के पिता देवेंद्रनाथ ने अपनी पर हाथ बढ़ाया था। रवींद्रनाथ सचाई से जमींदारी बचाई थी। अपनी सचाई, त्याग, धार्मिकता, विद्या और निर्जन-प्रियता के लिये वह महर्षि कहलाते थे रवींद्र- नाथ के जन्म के कुछ वर्ष पहले से हो महर्षि प्राय: देशाटन में समय अतिवाहित करते थे / कभी कभी थोड़े दिनों के लिये घर चले आया करते थे । घर पर शैशव में रवींद्रनाथ को बाहर के महल में नौकरों के रक्षावेक्षा में रहना पड़ता था । वे उन्हें मारते थे और उनके साथ निर्दय व्यवहार करते थे प्राथमिक शिक्षा घर ही पर आरंभ हुई थी। प्रति शैशव में ही वह ओरिएंटल सेमिनरी में दाखिलं किए गए थे। वहाँ की शासन प्रणाली देखकर वह घबरा गए थे । कुछ समय के बाद वह नार्मल स्कूल में भर्ती किए गए