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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/१५८

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श्री नलिनीमोहन सान्याल, भाषा तत्त्व-रत्न, एम० ए० ११५ थे । साथ साथ घर में भी पढ़ाई चलती थी। अपनी "जीवन-स्मृति" में रवींद्रनाथ घर की पढ़ाई का विवरण यों देते हैं. "सुबह छः बजे से साढ़े नौ बजे तक पढ़ने का समय था । प्रत्यूष में अंधेरा रहते ही बिछाने से उठकर पहले ही लँगोटी बाँध- कर एक काने पहलवान के साथ कुश्ती लड़नी पड़ती थी । उसके बाद मिट्टी लगे हुए बदन पर कुर्ता चढ़ाकर पदार्थ - विद्या, गणित, रेखा- गणित, इतिहास, भूगोल और 'मेघनादवध' काव्य पढ़ना पड़ता था । स्कूल से लौटते ही ड्राइंग और जिमनास्टिक के मास्टर हमारे सिर पर बैठ जाते थे । संध्या के बाद अँगरेजी की पढ़ाई होती थी। इसके अतिरिक्त हमें मुग्धबोध व्याकरण, अस्थि-विद्या और संगीत सिखाने का भी प्रबंध था । बँगला शिक्षा बहुत दूर अग्रसर होने पर हमारी अँगरेजी शिक्षा आरंभ हुई थी." परिवार के स्त्री- संगीत की चर्चा लड़कपन में रवींद्रनाथ को बड़ी भारी सुविधा यह थी कि उनके घर में आठों पहर साहित्य की हवा चलती थी । पुरुष सभी लोग शिक्षित थे और साहित्य त करते थे । तीन बड़े भाई बड़े भारी विद्वान थे। बहनों में एक भारी विदुषी और ग्रंथ - रचयिता हैं । बाकी बहनें और चचेरे भाई लोग साहित्य सेवा और संगीत का अभ्यास करते थे । वे अपने घर में नाटक भी खेलते थे । महात्मा राममोहन राय ने ब्राह्म समाज की प्रतिष्ठा कर बंगीय अँगरेजी शिक्षित युवकों को ईसाई धर्म ग्रहण करने से बचाया था । यह समाज अँगरेजों के अनुकरण पर गठित हुआ था और इसका धर्ममत एकेश्वरवाद है: इसमें जाति-भेद नहीं है और न इसकी महिलाओं में पर्दे की रीति है। इसमें से बाल्य- विवाह और बहु विवाह उठा दिए गए हैं। राजा राममोहन राय के बाद महर्षि देवेंद्रनाथ ब्राह्म समाज के नेता हुए । उनके घर से देव देवियों की पूजा उठ गई । अपने घर की स्त्रियों को नाना विद्याओं और कलाओं में सुशिक्षित करने में महर्षि के घन ने उनकी बड़ी सहायता की । वस्त्रन्धन- तंडुल चिता तो थी ही नहीं !