११६ रवींद्रनाथ ठाकुर परिवार के लोगों को विद्या चर्चा के लिये बहुत अवसर मिलता था । क्रमशः उनमें ललित कलाओं का ऐसा एक शौक उत्पन्न हुआ कि महर्षि का परिवार एक आदर्श परिवार में परिणत हो गया। इसी संस्कृतिपूर्ण वातावरण में रवींद्रनाथ का जन्म हुआ था । कुछ समय के बाद रवींद्रनाथ नार्मल स्कूल से हटा लिए गए । अब उनकी बँगला शिक्षा बंद हो गई । पर रवींद्र कहते हैं कि उन्होने लड़कपन में बंगला सीखी थी और इसी भाषा के माध्यम से उनकी अन्यान्य विषयों की शिक्षा हुई थी। इसी से उनके समग्र मन की चालना हो सकी थी। । अब वह बंगाल एकाडेमी नामक एक फिरंगियों के स्कूल में गए। वहाँ लैटिन की शिक्षा होने लगी । इसी समय रवींद्रनाथ का उपनयन हुआ । उपनयन के बाद उन्हें महर्षि के साथ दो हिमालय की यात्रा करनी पड़ी। उस समय उनकी अवस्था ११ वर्ष की थी। पहले कुछ दिन वीरभूम जिले के बोलपुर में रहे । बोलपुर के एक सुंदर अंश में महर्षि का एक विस्तीर्ण भूमिखंड या जहाँ उन्होंने एक पक्का मकान बनवाकर उसका नाम शांति-निके. तन रखा था । वांद्रनाथ को कलकत्ते के बाहर जाने का कभी सौभाग्य नहीं हुआ था । यहां के मुक्त आकाश और प्राकृतिक शोभा से उन्हें बड़ा आनंद मिला यह कुछ दिन रहने के बाद वह पिता के साथ गए और एक महीना रहकर गुरुद्वारा इत्यादि देखने के नंतर चैत्र मास के शेष भाग में उन्होंने उल है। सी पहाड़ की यात्रा की । यद्यपि वैशाख का महीना था तो भी जाड़ा बहुत था। वह अकेले पहाड़ों पर घूमा करते, महर्षि कुछ बाधा नहीं देते थे । वह कभी लड़कों की स्वतंत्रता में बाधा नहीं देते थे। उनके आदेश से रवि को ढे पानी से नहाना होता था । निर्दिष्ट समय पर महषि उन्हें पढ़ाते थे । पिताजी से उन्होंने इस समय कुछ अँगरेजी कुछ संस्कृत व्याकरण और कुछ ज्योतिष विज्ञान सीखा था । पर उनके अँगला पढ़ने का कोई विराम न था। पहले जिस शाखन 1
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