. . ( ३ ) इस दो साल में ही इसने बहुत उन्नति कर ली । उस समय संयुक्त प्रति के न्यायालयों में नागरी लिपि का प्रचलन नहीं था । विषय को लेकर नागरीप्रचारिणो ममा ने बहुत आंदोलन किया । महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, बाबू श्यामसुंदरदास और बाबू राधाकृष्णदास ने जिस लगन से इसके लिये प्रयत्न किया, वह प्रशंसनीय है । बाबू कृष्णबलदेव वर्मा और पंडित केदारनाथ पाठक ने भी भिन्न भिन्न स्थानों में घूमकर इसका प्रचार किया। अंत में पाँच वर्ष तक निरंतर आंदोलन करने के बाद २१ अप्रैल १६०० को संयुक्त प्रांत की सरकार ने देवनागरी को भी न्यायालय की लिपि स्वीकार कर लिया। इतने ही से सभा संतुष्ट नहीं हुई, परंतु इसने हिंदी में अर्जियां देने और अन्य कार्य करने का प्रचार प्रारंभ किया, जो अब तक चल रहा हैं ! सभा ने जो दूसरा महत्वपूर्ण कार्य किया है, वह प्राचीन हिंदी पुस्तकों की खोज है। हिंदी का प्राचीन साहित्य अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य से कम नहीं था, परंतु उस तरफ किसी नं ध्यान नहीं दिया। सभा ने बंगाल एशियाटिक सोसायटी और क प्रांतीय सरकारों से हिंदी पुस्तकों की खोज करने के लिये लिखा पढ़ी की ! बंगाल की एशियाटिक सोसायटी और संयुक्त प्रांत की सरकार ने भी इस संबंध में कुछ प्रयत्न किया, परंतु वह सफल न हुआ यह देखकर सभा ने स्वयं एक योजना तैयार की, जिसके लिये संयुक्त प्रांतीय सरकार ने १८०० में ४००) रुपए दिए और १६०१ से ५००) रुपए प्रतिवर्ष देना निश्चय किया ! १६१६ में यह महा- यता १००० रुपए प्रतिवर्ष और १९२२ में २०००) रुपए प्रतिवर्ष हो गई। इस सहायता से सभा ने इधर बहुत कार्य किया, जिसकी वार्षिक या त्रैवार्षिक रिपोर्ट गवर्मेंट छापती रही है । इन रिपी को भारतीय और विदेशी विद्वानों ने बहुत पसंद किया। बाळ श्यामसुंदरदास, पंडित श्यामविहारी मिश्र, पंडित शुकदेव विहारी मिश्र और बाबू हीरालाल ने इस संबंध में समय समय पत्र ख
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