श्री नलिनीमोहन सान्याल, भाषा-तत्त्व - रत्न, एम० ए० १२१ इसके बाद ही 'प्रभात-संगीत' है । परंतु 'संध्या-संगीत' के भावों के साथ इसके भावों का संपूर्ण व्यतिक्रम है । "प्रभात- संगीत" में कवि ने मानों विश्व-प्रकृति के आनंद को जिसे उन्होंने खो दिया था फिर से पाया है । व्यस्वस्थ अवसाद का भाव बिलकुल कट गया है । इस आकस्मिक व्यानंद का क्या कारण था ? बहुत संकोच के साथ इसका उत्तर में यां देता हूँ अब तक कवि का अवसाद कदाचित् निःसंगता के कारण उत्पन्न हुआ होगा, परंतु ठीक इसी समय उनका विवाह हुआ था अभिलषित संगिनी से मिलित होने के कारण उनके मनोभाव का आकस्मिक परिवर्तन होना असं भव नहीं है । इस पुस्तक को "निर्झरेर स्वप्न भंग " नामक कविता से उनके हृदय का आनंद झलकता है । "प्रभात उत्सव" में भी यह आनंद दृष्ट होता है । । हारायेदि श्रामार ग्रामारे आज यामि श्रमि कारे । बहु दिन परे एकदि किरण गुहाय दियेछे देखा, पछे यामार यांधार सलिले एकटि कनक रेखा । प्राखेर आवेग राखिते नारि, थरथर करि कांपिछे वारि, टलमल जल करे खलखल कलकल करि धरेछे तान । हृदय आज मोर केमने गेल खुलि ! जगत यासिसेवा करिछे कोलाकुलि ! घराय बाछे जत मानुष शत शत श्रासिछे प्राणे मम, हासिछे गलागलि | एसे सखा सखी बसिया चोखीबाखी, दाँड़ाइये मुखमुखी हामि शिशुगुलि, एसेछे भाइ बोन पुलके भरा मन १६
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