१२२ रवींद्रनाथ ठाकुर 'प्रभात - संगीत' में ही कवि के सारे जीवन के भावों की भूमिका निहित है। अंश के भीतर संपूर्ण की, सीमा के भीतर असीम की निविड़ उपलब्धि करना ही रवींद्रनाथ के समस्त जीवन की साधना है। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि यह सर्वानुभूति ही उनके काव्य का मूल सूत्र है और यही भाव एक नूतन चेतना के समान उनके भीतर काम करता आया है कवि की दृष्टि के आवरण के आक- स्मिक उन्मोचन से जो अखंड मात्र पहले उपलब्ध हुआ था उसी ने, जीवन की विचित्रता के खंड खंड पथों में चालित होकर, शेष अवस्था में कवि को एक अखंड सौंदर्य की उपासना में नियत रखा है । इस काव्यग्रंथ की 'प्रतिध्वनि' कविता का भाव यह हैं कि वस्तु- जगत् के अंतराल में एक असीम अव्यक्त गीति जगत है, जहाँ समस्त जगत् की विचित्र ध्वनियां, संगीत में परित है। अनाहत शब्द' के रूप में, निरंतर बज रही हैं उसकी प्रतिध्वनि प्रत्येक खंड सौंदर्य के खंड सुर में पाई जाती है। | रवींद्रनाथ ने जगत् के सौंदर्य को कभी सुर के और कभी आलोक के भाव से वर्णित किया है । डाकिले भाइ, आइ' ग्रामिने श्रसिद्धि × x × पण पुरे गेट हर हर भोर जगले केह नाइ सदा मोर 1. जे दिके यखि जाय में दिके ये पार्क जाहारि देखा पाय तारे का डाके । Plato कीजिए । गीतांजलि-- Music of the Spheres à ora azar तुमि केमन करे गान करो जे गुणी, प्रवाक ये शुनि, केवल शुनि । सुरेर श्री भुवन केले जे, सुरेर हवा चले गगन ये, पापास टुटे व्याकुल वेगे ये बहिया जाय सुरे सुरधुनी ।
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