श्री नलिनीमोहन सान्याल, भाषा तत्त्व-रत्न, एम० ए० १३१ हर जीवन में इस विशेष धारा के साथ 'जीवन - देवता' की लीला चल रही हैं । स्वर्गीय बाबू मोहितमोहन सेन कहते हैं-- M 'जीवन-देवता' को विश्व-देवता कहने से भ्रम होगा । 'अहं- बोध वा व्यक्तित्व-बोध का एक नूतन तत्त्व रवींद्रनाथ में प्रतिभात हुआ है । 'अहं' के क्षेत्र में जीवन-देवता की विशेष लीलाएँ हैं । 'अहं' वा व्यक्तित्व को ही वह जीवन जीवनांतर में बराबर विश्व के सब पदार्थों के साथ संयुक्त कर बृहत् से बृहत्तर बना रहे हैं | विकाश के हर एक पर्याय में कितनी ही वस्तुओं के भीतर होकर यह 'अहं' उन सब विचित्र जीवनों की विस्मृत स्मृति किसी न किसी आकार में वहन कर लाया है । जो जीव कोष उद्भिद में हैं, यदि उसी का संचार मेरे शरीर में होता हो, तो ऐसा अनुमान करने में क्या दोष हैं कि मेरा जीव- कोप-समूह बहु युगों के विचित्र जीवनों की स्मृति लाया है? इसलिये 'मैं' सब विश्व प्राण के आनंद का अनुभव कर सकता है - तरु-लताओं और पशु-पक्षियों की चेष्टाओ का आनंद मुझे स्पर्श करता है । यह कल्पना मात्र नहीं है। हमारे ऋषियों ने इसकी उपलब्धि की है। अन्य देशों में भी Wordsworth इत्यादि ने इसका अनुभव किया हैं । आत्मबोध वा व्यक्तित्व बोध का मूल सीधे विश्व अभिव्यक्ति के आरंभ- काल तक पहुँचा है । इसी लिये अ-बाव में विश्व-बोध इतने सहज में, और इतनी प्रबलता से प्रकट होता है । हम केवल एक एक मनुष्य ही नहीं हैं । हमारे भीतर नाना- जीव- भाव भी काम कर रहा है । इस 'मैं' के स्वामी हैं जीवन- देवता । इन्हीं ने सब विकाश के भीतर - प्रथम वाष्प-नीहारिका. तब आदिम अणु-परमाणु, तब आदिम जीव- कोष, तब तरु-लता, कीटपतङ्ग, सरीसृप, पक्षी, पशु इत्यादि वस्तुओं तथा प्राणियों के भीतर क्रमशः रखकर 'मैं' को वर्तमान अवस्था में परिणत किया है । जीवन-देवता ने विश्व विकाश की नाना अवस्थाओं में
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