१३६ रवींद्रनाथ ठाकुर के प्रयोजन का आविष्कार किया है। हिंदू समाज के आधुनिक 'युक्ति-दीन आचार के बंधन के साथ आध्यात्मिक जीवन का मिलन कैसे हो सकता है, यही वह देशवासियों को दिखाना चाहते थे । संसार का बेड़ा पार करने का अर्थ यह नहीं है कि संसार के साथ कोई संबंध न रखा जाय; उसका अर्थ भीतर सत्य करके जानना । इस प्रकार के है संसार को ब्रह्म के ज्ञान से भोग और त्याग में कोई विच्छेद नहीं रहता । कर्म के द्वारा कर्म बंधन के छेदन की उपलब्धि करना ही यथार्थ साधना है । यह कहा गया है कि 1 1 केवल भाव के द्वारा चालित होने से वास्तव को दूर भगाना है वास्तव क्षेत्र में भावुक को टक्कर खानी पड़ती है । रवींद्रनाथ इस सत्य को खूब जानते थे । इस समय के लिखित 'गोरा' नामक उपन्यास में कवि ने इस तत्त्व का विश्लेषण किया है। रवींद्रनाथ की स्वदेशिकता सं० १९६० में कवि का स्त्री-वियोग हुआ । इस प्राघात ने उनके चित्त को कठिन त्याग की ओर असर किया । तभी से वह एक प्रकार से संसार से विच्छिन्न है } अपनी शक्ति, सामर्थ्य, अर्थ और समय को उन्होंने इस त्याग की तपस्या को पूर्ण करने के लिये लगाया हैं । स्त्री-वियोग के एक बरस पीछे उनकी मध्यमा कन्या की मृत्यु हुई। यही शोकपूर्ण घटना "शिशु " नामक काव्य लिखने का कारगा थी । इसकी कविताएँ वात्सल्य रस से भरपूर हैं । बच्चा माता से पूछता है कि तू मुझे कहाँ से उठा लाई है ? माँ कहती है कि तू मेरे मन के भीतर इच्छा के रूप में था। विश्व के आनंद- उत्ल से मूर्ति धारण कर शिशु प्रकाशित होता है । यही वैष्णव माधुर्य-तत्त्व है। जो लोग भगवान् को वात्सल्य रस के द्वारा देखते हैं, उन्हीं कां माधुर्य रस 'शिशु' काव्य में प्रवाहित है
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