१४५ कौटिल्य-काल की कुछ प्रथाएँ राक्षस विवाह है। 'सुतमत्तादानात्पशाच: ' सोती हुई - कन्या का उठा ले जाने से पैशाच विवाह होता है। ऐसा जान पड़ता है कि विवाह बड़े होने पर ही होते थे; क्योंकि 'सब विवादों में स्त्री-पुरुष की परस्पर प्रीति का होना अत्यावश्यक है' | I यही बात कई अन्य उल्लेखों से सिद्ध होती है ! बहुधा विवाह का करार नहीं तोड़ा जा सकता था । तथापि कुछ परिस्थिति में ऐसा हो सकता था । त्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों में पाणिग्रहण के पहले विवाह का करार तोड़ा जा सकता था, पर उसके बाद नहीं । शूद्रों में यह मर्यादा प्रथम सम्मिलन तक थी। परंतु प्रथम तीन वर्षों में भी 'पशायिक दोष' * (ब्रह्मचर्य के उल्लंघन का दोष ? ) दीख जाय तो पाणिग्रहण के बाद भी विवाहोच्छेद हो सकता था, पर लड़के बच्चे होने पर नहीं । अपने यहाँ पुरुषों को एक से अधिक पत्नियां करने का अधिकार है । इसका उपयोग या तो धनी पुरुष करते हैं कि जिन्हें कामाचार के सिवा संसार में कोई दूसरा काम नहीं देख पड़ता या वे लोग करते हैं जिन्हें प्रथम या द्वितीय स्त्री से लड़के बच्चे नहीं होते या किसी स्त्री से केवल लड़कियां होती हैं। की टिल्य का बताया नियम यदि उस समय प्रचलित था, तो यही कहना होगा कि उस समय की रीति आज से अधिक अच्छी थी। कौटिल्य कहता है 'यदि किसी स्त्रा के बच्चा पैदान हो या उसमें वा पैदा करने की शक्ति न हो तो उसका पति आठ वर्ष तक राह देखे,
- पंडित उदयवीर शाखी ने 'वृत्तपाणिग्रहयोरपि दोषापशायिक दृष्ट्वा
farada' का अर्थ दिया है- "प्रथम तीन वर्गों में पाणिग्रहण हो जाने पर भी यदि स्त्री पुरुष के एक साथ प्रथम शयन काल में किसी में (श्री या पुरुष में) कोई दोष मालूम पड़े तो विवाहसंबंध तेखा जा सकता है ।" इसी का श्री शामशास्त्री ने यह अर्थ किया है- 'पाणिग्रह के बाद यदि यह जान पढ़े कि वधू का पहले किसी से संभोग संबंध हो चुका है, तो विवाह तोड़ा जा सकता हैं। यह छिपाने के लिये आगे जो दंड यादि बताए हैं उससे यहीं जान पड़ता है कि श्रीशामशास्त्री का ही अर्थ विशेष ठीक है ।