१४४ कौटिल्य-काल की कुछ प्रथाएँ ( यानी तलाक ) के विषय में प्रथम ही कहा है 'अमोक्षो धर्मविवाहा- नामिति' -धर्म विवाहों में ( यानी पहले चार प्रकार के विवाहों में ) 'मोक्ष' नहीं हो सकता । ( तथापि कुछ परिस्थितियों में 'मोक्ष' हो सकता था। उनमें से मुख्य है 'परस्परं द्वेपान्मोक्षः --- एक दूसरे का द्वेष होने पर मोक्ष हो सकता है ।" परंतु इसके पहले यह स्पष्ट बता दिया है कि केवल एक ( यानी केवल पति या पत्नी ) दूसरे का द्वेष करे तो मोक्ष यह ऊपर बता ही चुके हैं कि धर्म-विवाहों में मोक्ष की रीति केवल अंतिम चार प्रकार के नहीं हो सकता । मोक्ष निषिद्ध है । विवाहों के लिये बताई है | 'कन्याप्रघर्ष यानी बलपूर्वक स्त्री-भोग करने के लिये उस समय आज से बहुत कड़े दंड थे । इस विषय में यहाँ पर विस्तारपूर्वक कहने की आवश्यकता नहीं । कि विवाहिता स्त्रो के साथ ( हम सारांश में यह बता सकते हैं कुछ अवस्थाओं को छोड़कर ) संभोग करना चाहे स्त्री की इच्छा भले ही हो, दंडनीय होता था। अक्षत- योनि कन्या से संग करने पर प्रत्येक पुरुष देख पाता था । हाँ, सकामा और क्षतयोनि स्त्री के साथ उसका भावी पति, सात मासिक धर्म के बाद, संग करे तो दंडनीय न होता था । यह तभी क्षम्य था जब उस स्त्री का निश्चित विवाह का हुआ हो। इसी प्रकार तीन वर्ष तक मासिक धर्म होने पर यदि कन्या का विवाह न किया जाय तो कोई भी सवर्ण पुरुष उसके साथ, उसकी इच्छा होने पर, संबंध कर सकता था। पर यह स्मरण रहे कि इन दोनों अवस्थाओं में उन स्त्री पुरुषों का विवाह होना आवश्यक था । हाँ, चारों के हाथ से, नदीप्रवाह से, दुर्भिक्ष से बचाकर और जंगलों में भटकती हुई तथा मर गई है ऐसा समझकर छोड़ी हुई पराई स्त्री की आपत्ति से बचाकर दोनों की इच्छा होने पर कोई भी पुरुष भोग सकता है । स्मरण रहे कि यह कार्य इन अवस्थाओं में भी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध नहीं किया जा सकता था । } विवाहिता स्त्री
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