श्री गोपाल दामोदर तामस्कर एम० ए० १४५ से व्यभिचार करनेवाला पुरुष ही नहीं वह स्त्रो भी दंडनीय होती थी । जार के लिये मृत्युदंड तथा स्त्री के लिये नाक-कान काटने का दंड कौटिल्य ने बताया है । दंड के कुछ प्रकार बदल दिए जायें तो कौटिल्य के बताए इस विषय के कई नियम आज भी व्यवहार में लाने योग्य हैं । उस समय नियोग की प्रथा स्पष्टतया थी । तीसरे अधिकरण के छठे अध्याय के अंत में कहा है- क्षेत्रे वा जनयेदस्य नियुक्तः क्षेत्रजं सुतम् । मातृबंधुः सगोत्रो वा तस्मै तत्प्रदिशेद्धनम् || 'अथवा उसकी स्त्री से नियोग के द्वारा उत्पन्न हुआ लड़का या उसकी माता के बंधु-बांधव या कोई सगोत्र उसकी संपत्ति का अधिकारी समझा जावे' । पहले अधिकरण के १७वें अध्याय में कहा है- 'वृद्धस्तु व्या- धितो वा राजा मातृबंधु कुल्य गुणवत् सामन्तानामन्यतमेन क्षेत्रे बीज- मुत्पादयेत् - अथवा यदि राजा बूढ़ा हो गया हो या सहा बीमार रहता हो, तो अपने मातृकुल के या अपने बंधुकुल के किसी पुरुष से या गुणवान् सामंत से नियोग के द्वारा अपनी स्त्री में पुत्र उत्पन्न करा ले' । इसी प्रकार तीसरे अधिकरण के पाँचवें अध्याय में कहा है- तेर्षा च कृतदाराणां लुप्ते प्रजनने सति । सृजेयुः बांधवा पुत्रांस्तेषामंशान् प्रकल्पयेत् ॥ 'यदि इन उपर्युक्त पुरुषों की स्त्रियाँ हों, परंतु अपनी अशक्ति से ये उनमें बच्चे पैदा न कर सकें तो इन पुरुषों के बंधु बांधव उनमें जिन पुत्रों को उत्पन्न करें, वे अपनी पुरानी जायदाद के दाय- भागी हो सकते हैं ।' पहले उदाहरण में पति के मृत होने पर नियोग की रीति है, पर दूसरे उदाहरण में पति के जीवनकाल में उसमें प्रजनन-शक्ति न होने के कारण उसे उचित बताया है । यह सब जानते ही हैं कि नियोग की रीति केवल संतति कौ, विशेषकर, पुत्र १६ ,
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