श्री गोपाल दामोदर तामस्कर एम० ए० १५३ धर्म के नाम से आजकल जो अनेक बातें होती हैं उनमें से बहुतेरी उस समय भी थीं। उन्हीं में से एक प्रथा यह है कि कुल के बड़े लोगों की मृत्यु पर देवी के नाम पर कुछ जानवर छोड़ देते हैं । यह प्रथा बहुत पुरानी है। वो अधिकरण के तेरहवें अध्याय में एक स्थान पर कहा है- 'देवपशुमृषभमुचाणं गोकुमारी वा वाहयतः पंचशतो देव:-- देवता के नाम पर लाई हुए पशु, सांड, बैल, या बछिया को जो कोई पुरुष दंड दिया जाय : जोते उसे ५०० गण आजकल जिस प्रकार नाबालिगों की जायदाद के लिये ट्रस्टी बनाने की प्रथा है उस प्रकार उस समय में भी थी, ऐसा जान पड़ता है। दूसरे अधिकरण के पहले अध्याय में एक स्थान पर कक्षा है--- 'बालद्रव्यं मामवृद्धा वर्ध से युवहारप्रापणात बालक की संपत्ति की ग्रामवृद्ध (ग्राम के बूढ़े लोग उसके बालिग होने तक बढ़ाते रहें। यदि चुपचाप या कठिन स्थान से अपने राजा की सूचना देने का काम उसके अधिकारियों की करना पड़ता था, तब अन्य उपायों के अलावे पर कबूतरों से भी काम लेते थे । इसका उल्लेख दूसरे प्रधिकरण के इवें अध्याय में है । विवाह करने के पहले, संकटावस्था में स्त्री के पालन पोषण के हेतु दो हजार ( पथ ? ) अलग रखने का नियम कौटिल्य ने बताया है परमिथाप्या वृत्तिः ? विषय के नियमों से ऐसा जान पड़ता इससे तथा इसके खर्च के कि यह धन किसी सुरक्षित स्थान में रखा जा सकता था तीसरे अधिकरण के पाँचवें अध्याय में है- स्पष्टतया कहा है - 'अप्राप्तव्यवहाराणां देयविशुद्धं मातृबंधुषु ग्रामवृद्धेषु वा स्थापयेयुयवहारप्रापणात्प्रोषितस्य वा बालिग होने तक नाबालिगों की संपत्ति, ठीक ठीक हिसाब के साथ उनके मामा अथवा गांव के वृद्ध विश्वासी पुरुषों के पास रख दी जावे; विदेश में गए हुए पुरुष की संपत्ति का भी इसी तरह प्रबंध होना चाहिए । इस वाक्य में तो ट्रस्टी पद्धति स्पष्ट देख पड़ती है । और यह देख- २०
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