( ६ ) प्राचीन आर्यावर्त और उसका प्रथम सम्राट् | लेखक - श्री जयशंकर प्रसाद ] पाश्चात्य विद्वानों ने संसार की सबसे महान और प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद और उसके परिवार के शास्त्रीय ग्रंथों का अनुशीलन करके हमारी ऐतिहासिक स्थिति को बतलाने की चेष्टा की है, और उनका यह स्तुत्य प्रयत्न बहुत दिनों से हो रहा है। किंतु इस ऐतिहासिक खोज से जहां हमारे भारतीय इतिहास की सामग्री बनने में बहुत सी सहायता मिली है उसी के साथ अपूर्ण अनुसंधानों के कारण और किसी अंश में सेमेटिक प्राचीन धर्मपुस्तक (Old Testament) के ऐतिहासिक विवरणों का मानदंड मान लेने से बहुत सी भ्रांत कल्पनाएँ भी चल पड़ी हैं । बहुत दिनों तक पहिले, ईसा के २००० वर्ष पूर्व का समय ही सृष्टि के प्रागू ऐतिहासिक काल को भी अपनी परिधि में ले आता था । क्योंकि ईसा से २००० वर्ष पूर्व जलप्रलय का होना माना जाता था और सृष्टि के आरंभ से २००० वर्ष के अनंतर जल प्रलय का समय निर्धारित था- इस प्रकार ईसा से ४००० वर्ष पहले सृष्टि का प्रारंभ माना जाता था । बहुत संभव है कि इसका कारण वही अंतर्निहित धार्मिक प्रेरणा रही हो जो उन शोधकों के हृदय में बद्धमूल थी । प्रायः इसी के वशवर्ती होकर बहुत से प्रकांड पंडितों ने भी, ऋग्वेद के समय- निर्धारण में संकीर्णता का परिचय दिया है। हर्ष का विषय है की प्रनतत्त्व और भूगर्भ शास्त्र के नए नए अन्वेषणों और आविष्कारो ने मानव जाति के प्राग ऐतिहासिक काल का, और उसके साथ ही आर्य संस्कृति को भी अधिक पुरातन कर दिया है । काल की सीमा विस्तृत हो चली है 1 फलत: उस
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