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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२१

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( 5 ) आवश्यकता पड़ी। इस महत्वपूर्ण कार्य की समाप्ति का श्रेय शबू श्यामसुंदरदास और उनके सहयोगियों को है । बाबू साहब के अथक परिश्रम, सच्ची लगन, प्रशंसनीय संघटन तथा प्रबंधयोग्यता से यह ग्रंथ पूर्ण हो सका है । | पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी ने इस कोश के संबंध में अपने प्रेमेोद्गार इस प्रकार प्रकट किए हैं- "प्रमादाद्वार काशी की नागरी प्रचारिणी सभा से मेरा संबंध प्रायः उसके जन्मकाल ही से है । जिस तरह एक बहुत ही छोटे से बीज से विशाल वटवृक्ष विकसित होता है उसी तरह यह सभा भी बहुत छोटे श्राकार से विकसित होती हुई अपने वर्तमान आकार प्रकार को प्राप्त हुई है । इसका विशेष श्रेय इसके काशी-निवासी कुछ समासदों और कार्यकताओं को है। पहले इसकी तरफ बाहरी और हिंदी के हितों का ध्यान कम था। परंतु अब यह बात नहीं । यत्र तो उनमें से भी अनेक कृतविध सज्जन इसकी सहायता और उति के कार्य में वृत्तचित हैं । इस सभा को अनेक वितन्वायायी का सामना करना पड़ा है। इसके काव्य-कलापों की कठोर यातनाएं भी होती रही है और अब भी कभी कभी हो जाती है । सुके पेड़ है, पर सच्चे हृदय से स्वीकार करना ही पड़ता है, कि इन विरोधात्मक श्रोताओं के कर्ताओं में सुरु अवन की भी कई बार प्रवृत्ति हो चुकी है। इसका प्रायश्चित भी मैं कर चुका हूँ। यह सब होते हुए भी सभा के कार्यकर्ता अपने उद्दिष्ट पथ से भ्रष्ट नहीं हुए । उनके इस मातृभाषा- प्रेम और हदयौर्य की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। उन्होंने सारी विवाधाओं का उल्लंघन करके सभा को उस उच्च स्थिति को पहुँचा दिया है जिससे उस जनसमुदाय इस समय देख रहा है। सभा ने देवनागर-लिपि के अचार और हिंदी भाषा के साहित्य की उन्नति के लिये अनेक काम किए हैं। उन सब में उसका एक काम सब से अधिक उल्लेखयोग्य है । वह है हिंदी शब्दसागर नामक विस्तृत कोश का निम्म यह कोश शब्दकल्पद्रुम, शब्दम्तोममहानिधि और सेंट पिटर्सवर्ग में प्रकाशित की समकक्षता करनेवाला है। अपने देश की किसी अन्य प्रचलित भाषा में निर्मित इस तरह का कोई अन्य कोश मेरे देखने में नहीं ग्राया । यह कई जिल्दों में है और गवर्मेंट तथा अन्य हिंदी हितैषियों द्वारा धन की सहायता से अनेक वर्षों के कठिन परिश्रम की बदौलत अस्तित्व तो वर्तमान और प्राचीन भाषाओं के अनेक कोश हैं और बड़े में आया