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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२१३

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१७० प्राचीन आर्यावर्त और उसका प्रथम सम्राट वर्ष की सीमा के अंतर्गत माने जाते हैं और भारत की यह सीमा सिकंदर के आक्रमण के समय भी मानी जाती थी । यह तो थी मूलभूमि; पर इसके पूर्ण विस्तृत रूप के लिये पिछले काल में और भी दो नाम मिलते हैं - आर्यावर्त और भारत । यद्यपि इसके संबंध में पुराणों में कितने ही विवरण दिए गए हैं, किंतु अधिक संगत यही मालूम होता है कि वैदिक भरत जाति की आवास-भूमि होने के कारण ही इसे भारतभूमि कहने लगे थे। समयों का इतना विशेष अंतर है कि इस नाम के साथ काल का निर्देश नहीं किया जा सकता : भृगुप्रोत्त: मनुस्मृति में उस काल की आय संकुचित ही दिखाई देवी है। हिमालय की सीमा वर्तमान भारत से और विध्याचल के बीच संभवतः हविय के प्राय- को ही भूमि को आदान से | द्वीप से भारत का उस काल में संबंध नहीं था, और उधर निषेध पर्वत माला हिमालय का ही परिवार मानी जाती थी । यहाँ हिमालय साबण नाम है। स्वर्ग और गेरु का निर्देश करने के अनंतर हमें यह भी देखना पड़ेगा कि आयविर्च का वैदिक विस्तार कितना था । जिगनी और पर्व का वर्णन वैदिक साहित्य में मिलता है उनसे अधिक भूमि की वैदिक काल का आयविर्त्त मान लेने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती । अविनाशचंद्र दाम ने वैदिक काल में इस देश को 'सप्तसिंधु' नाम से अभिहित किया हैं। अविक ध्यान देने से तो यह मालूम पड़ता है कि उक्त देश और लग्न तसिंधु में आय की बनी बस्ती थी। किंतु उतनी ही सीमा में श्राय्र्य विस्तार को संकुचित रखने के लिये वैदिक काल के अन्य भौगोलिक प्रमाण वारणा करते हैं दास ने अपने 'ऋग्वेदिक इ ंडिया' में बड़ी विद्वत्ता से भूगर्भ यदि शात्रों के प्राधार पर सिद्ध किया है कि प्राचीन सिंधु चारों और समुद्रों से घिरा था। उन्होंने उसी प्रदेश को आर्यभूमि माना है-जैसा कि आचार्य सत्यव्रत साम- श्रमी ने अपने पांडित्यपूर्ण 'ऐतरेयालोचन' में निर्देश किया था !