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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२२४

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श्री जयशंकर प्रसाद " अभिनेते अद्रिवो यत्स्था जगरुन रेजते १८२ त्वष्टा चित्तव मन्यव इंद्र वेविज्यते भियान्ननु स्वराज्यम्।” - १४ "नहि नु यादवीमसी का वीर्या परः । ऋतुं देवा ग्रजांसि संदधुररुन्ननु स्वराज्यम् - १५।" तस्मिन्नुम्मुत- मंत्र-संख्या १४ में साम्राज्य या स्वराज्य स्थापन करनेवाले इंद्र के भय से, त्वष्टा को, काँपते हुए लिखा है और १५ में देवों का इंद्र में पूर्ण मनुष्यता (नृम्ण ) और आज के स्थापन की घोषणा है । पूर्वज घे । ऋग्वेद मंडल प्रायों की वाणिज्य करनेवाली जाति के पक्षि लोग उस संघर्ष में असुरों से मिल गए थे यही लोग संभवत: प्राग ऐति- हासिक काल के फिनीशियन लोगों के १०-१०५ के सूक्त में उनका उल्लेख है आज भी जरत्वष्ट्र के अनुयायी व करते हैं---"हम देवों को भगाते हैं और अपने को जरथुस्त्रयन देवविरोधी स्वीकार करते हैं। * में इसी संघर्ष के कारण दीक्षित होते हुए प्रतिज्ञा इस प्रकार प्राचीन काल के पूज्यमान असुर पिछले काल में वेदों में विरोधी मान गए । और, देव लोग ईरानी प्रास्यों के यहां शत्रु समझे गए। आज तक ईरानी संस्कृति में देवजादा या कालादेव- सफेददेव उसी ध्वनि का योतक है । एवं अवेस्ता के अनुसार इंद्र शौर्व ( शर्व ? ) तथा नासत्य दुष्टात्माओं में गिने जाते हैं । 'दाग' (Hang ) का भी विचार था कि अहुरमज्द का धर्म, प्राचीन बहु- देववादमूलक वैदिक विचारों से एक धार्मिक विद्रोह रूप था ! यद्यपि ऋग्वेद में मंत्रों के संकलन से यह सूचित होता है कि उस काल में वैदिक धर्म, समन्वयवादी हो गया था । उसमें सब प्रकार

  • I drive away the Daevas, I profess myseli &

Zarathustrian at expeller of the Daevas, a follower of the teachings of Ahura, a hymn-singer, a plaiser of Amshaspands,--(P. 55, Zoroaster.)