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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२३८

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(१०) वर्तमान हिंदी में संस्कृत शब्दों का ग्रहण [ लेखक - महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ] सर्व-शक्तिमान जगदीश्वर की अपार कृपा से आज हमारी मातृ- भाषा हिंदी राष्ट्र-भाषा का समुचित आसन ग्रहण कर रही हैं। आज हिंदुस्थान मात्र के राष्ट्रीय नेता पुराने भेद भावों को भूलकर माता की सेवा के लिये उत्सुक दिखाई दे रहें हैं, आज सब विवाद हट- कर हिंदी पर संपूर्ण विज्ञ देशवासियों का मातृ-प्रेम प्रकट हो गया है। ऐसी दशा में तेईस कोटि हिंदुओं की मातृ-भाषा हिंदी का सर्वांगपूर्ण और सर्वेश में त्रुटिन्य होना अत्यंत आवश्यक है । अतएव आज हिंदी साहित्य-प्रेमी हिंदी के प्रचार की तरह हिंदी के परिष्कार को भी मुख्य लक्ष्य मानते हुए, उसकी और पूर्ण दृष्टिपात कर रहे हैं, और हिंदी भाषा के संबंध में कई प्रकार के विचार उप- स्थित होकर उनमें मतभेद और विवाद के भी कई अवसर प्राप्त रहे हैं । उनमें से विचार का एक मुख्य विषय यह भी है कि हिंदी- भाषा के मांडार में शब्दों की जो न्यूनता है, उसकी पूर्ति कहाँ से की जाय ? जिन विषयों के प्रतिपादन के लिये, वा जिन वस्तुओं और मनोभावों के संकेत के लिये हिंदी भाषा में शब्द नही मिलते, उनका प्रतिपादन वा संकेत किस भाषा के शब्दों द्वारा किया जाय ? कहने की आवश्यकता नहीं होगी कि इस विचार में भी विद्वानों का मतभेद है, और इस ही मतभेद के कारण आज हिंदी लिखने की शैली भिन्न भिन्न प्रचलित हो रही है। बहुत से विद्वानों का विचार है कि हिंदी भाषा में शब्दसमूह संस्कृत से ही लेना चाहिए, संस्कृत के द्वारा ही हिंदी भाषा का पालन-पोषण पूर्वकाल से होता रहा है, और अब भी उसके ही द्वारा इसकी पुष्टि होना संभव है। दूसरे कई एक विद्वान इस बात के पक्षपाती हैं कि जिस विषय वा वस्तु के लिये जिस भाषा का शब्द जनसाधारण