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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२४

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(" { ( ' ∈ ) बड़े हैं, पर जो विशेषता इसमें है वह शायद ही किसी और में हो। यह काम किसी एक ही मनुष्य के बूते का श्रा भी नहीं । यदि सभा इसके निर्माण के. लिये दत्तचित्त न होती तो किसी एक ही अन्य सजन के द्वारा इसकी रचना, कम से कम, इस समय में तो असंभव ही थी । अतएव इसके संपादक और विशेष करके प्रधान संपादक, बाबू, श्यामसुन्दरदास, बी० ए०, समस्त हिंदी- भाषा-भाषी जन-समुदाय के धन्यवाद के पात्र हैं । परमात्मा उन्हें दीर्घायु- सरोग्य दे और उनका सतत कल्याण करे ।" बाबू श्यामसुंदरदास की यह सेवा हिंदी साहित्य के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगी । इस कोष की समाप्ति के उपलक्ष में तथा अपने जन्मदाता और प्रधान पोषक बाबू श्यामसुंदरदास के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करने के लिये सभा यह काशोत्सव स्मारक संग्रह नामक ग्रंथ, जिसमें अनेक विद्वानों के गवेषणापूर्ण लेखों का संग्रह है, उन्हें निवेदित करके अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहती है । बाबु श्यामसुंदरदास बाबू श्यामसुंदरदास का प्राय: संपूर्ण जीवन नागरीप्रचारिणी सभा की उन्नति में व्यतीत हुआ है। इसलिये इनके जीवन को नागरी- प्रचारिणी सभा के कार्यों से पृथक नहीं किया जा सकता । इनके जीवन का संक्षिप्त परिचय मात्र दिया जाता है । यहाँ बाबू श्यामसुंदरदास का जन्म बनारस में लाला देवीदास खन्ना (खत्री) के घर जुलाई १८७५ ई० में हुआ था। इनके पूर्वज पंजाब में रहते थे। आज से ६५ साल पूर्व लाला देवीदास बनारस में आ बसे । श्यामसुंदरदास का बचपन बहुत आनंद में व्यतीत हुआ । बचपन में ही ये पाठशाला में प्रविष्ट हुए और १८६० ई० में मिडिल परीक्षा पास की। इसी समय से इनकी हिंदी से प्रेम उत्पन्न हो गया था। तुलसीदासकृत रामायण से इन्हें विशेष अनुराग था । १८८२ में इंट्रेंस पास कर ये कोंस कालेज में प्रविष्ट हुए कालेज में ही इन्होंने अपने जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य का प्रारंभ किया। अपने दो मित्रों के साथ मिलकर इन्होंने, १८ वर्ष की अवस्था में, नागरीप्रचारिणां सभा की स्थापना की। उसी समय से इन्होंने सभा के जीवन के माथ "'