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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२५८

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महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी 'का विवेकनिधिवल्लभहिं' तुमहिं सकत उपदेस ।' 'जासु ज्ञानरवि भवनिसि नासा । वचनकिरन मुनिकमल विकासा ॥' 'भववारथ दारण सिंह प्रभो । 'मन-संभव-दारुण-दोष-दरम् ।' 'ससुर एतादूस अवध निवासू ।' 'सोइ रघुवरहि तुमहिं करनीया ।' 'अबला विलेोकहिं पुरुषमय जग पुरुष सब अबलामयम् । दोइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अथम् ॥' 'करि विलाप रोदिति वदति सुता सनेह सँभारि ।" 'जीति काम अहमिति मन माहीं । 'लरहिं सुखेन काल किन होऊ ।' 'अज व्यापकमेकमनादि सदा । करुणाकर राम नमामि मुदा ॥' २१५ 'मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धतवरचाप रुचिरकर सायक ॥।' 'भववारिधि मंदर परम दर । वारय तारय संसृतिदुस्तर ॥' इत्यादि उनकी कविता के उदाहरणों को कौन नहीं जाना | श्रीसूरदासजी का भी क्या कहना है। वे संस्कृत-वाणी के सुरम्य चित्र लिखने में सिद्धहस्त हैं । श्री केशवदासजी तो इस काम में प्रसिद्ध, बल्कि बदनाम भी हो चुके हैं कि वे अपनी कविता में संस्कृत पद त देते हैं; किंतु टकसाली ब्रज भाषा के कवि बिहारी भी - 'नम लाली चाली निशा चटकाली धुनि कीन', 'आए 'वनमाली न', मुरली उर माल', 'सघन कुंज छाया सुखद, सीतल मंद समीर, 'दावानल की ज्वाल', 'मकराकृति गोपाल के', 'मन नीलमनि सैल पर आतप पो प्रभात', 'इंद्र-धनुष रँग होति', 'स्वेद सलिल रोमांच कुस', 'स्तन मन नयन नितंब को', 'प्रौढ विलाम "