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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२५९

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२१६ वर्तमान हिंदी में संस्कृत शब्दों का ग्रहण अमोठ', 'सुरपतिगर्व', 'नंदित करी' ' को घटि ये वृषभानुआ' ऐसे ऐसे शतशः प्रयोगों से बाज नहीं आते। भूषण महाराज भी 'नभ सरित के प्रफुलित कुमुद मुकुलित कमलकुल होत हैं', 'मंजुल महरि मयूर चटुल चातक चकोर गन', दिनकर सोहै तेरे तेज के निकर सेो' इत्यादि लिखने में नहीं चूकते। इन ऐसे महाकवियों पर यह कलंक लगाना बड़ी भारी घृष्टता है कि इन्होंने छंदों के अनुप्रास के लिये, छंदों के गयों की पूर्ति के अनुरोध से, वा शोभामात्र के लिये संस्कृत शुद्ध रूप लिख दिए । वाखी जिनके वश में है, वे पचासों तरह अनुप्रास मिला सकते हैं, सैकड़ों तरह गद्य-पूर्ति कर सकते हैं, शोभा उनके चरणों में लोटती है, जहाँ चाहें वहाँ पहुँच जायें । संस्कृत शब्दों के प्रयोग का इनका कारण वही पूर्वोक्त है कि ये सब संस्कृत भाषा के परम विद्वान थे, संस्कृत में ही इन्होंने शिक्षा प्राप्त की थो, इस कारण प्रकृतिवश इनके मुख से संस्कृत शब्द निकलते थे । पद्य ही क्यों, प्राचीन टीका आदि का जो गद्य-लेख मिलता है, उसमें भी तो संस्कृत शब्दों की कमी नहीं । तब प्रकृति ही इसका कारण है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। ये सब भाषा के जन्म-दाता हैं, इसलिये इनकी प्रकृति के अनुसार ही भाषा का स्वरूप बना, और यो शुद्ध संस्कृत-रूपों को हिंदी आदि भाषाओं में पर्याप्त स्थान मिलता गया । 1 यह प्रकृति ( आदत ) बहुत पुरानी है, क्योंकि अति प्राचीन काल की भाषा में भी ( जिसे अपभ्रंश भाषा नाम से भी पुकारा जाता है ) प्राकृत ध्यादि की उपेक्षा कर शुद्ध संस्कृत-रूपों की उस काल के कवि- महानुभावों ने स्थान दिया है। चंदबरदाई तो अपनी कविता में संस्कृत भाषा का होना स्वयं ही उद्घोषित करते हैं, 'पडूभाषा कुरानं व पुरानं कथितं मया' किंतु औरों की कविता में भी ऐसा पाया जाता है । श्रीगुलेरीजी ने नागरीप्रचारिणी पत्रिका की लेखमाला में जो 'पुरानी हिंदी' शीर्षक प्राचीनतम गाथाएँ उद्धृत की हैं उनमें से एक उत्तम उदाहरण देखिए-