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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२७७

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२३४ मरहठा शिविर संधि हो जाने पर अँगरेजी रेजिडेंट उनके साथ रहने लगा, जिसके साथ की अँगरेजी सेना का अध्यक्ष ई० स० १५०८ से कप्तान म्राटन* था। इसने सिंधिया महाराज के शिविर के साथ साथ रहते हुए अपने भाई का, जो इंगलैंड में था, ३२ पत्र लिखे थे । पहला पत्र करोली से २६ दिसंबर सन् १८०८ को और अंतिम अजमेर से २७ फर्वरी सन् १८०६ को लिखा था । इसके पत्रों से कुछ अंशों में सरला शिविर के एक वर्ष के चरित की झाँकी हो जाती है । प्रारंभ में महाराज दौलतराव सिंधिया का लश्कर कब और कहाँ से चला तथा उसने किस तिथि को यात्रा समाप्त की, यह सूचना अनुपलब्ध है और जो कुछ वृत्तांत उपर्युक्त पत्रों से प्राप्त है उससे छावनी का सर्वांग-परिपूर्ण परिचय नहीं दिया जा सकता : जो शिविर को व्यवस्था ज्ञात हो सकी है वह इस प्रकार है कि प्रस्थान के समय सर्वप्रथम बनीवाला ( Quarter- Master- General) आगे जाता था और वह जिस भूमि पर सेना को पड़ाव डालना होता वहाँ पहुँच छोटा सफेद झंडा गाड़ देना । उ पताका से निर्दिए स्थल पर महाराज के तंबू लगते जो ड्योढ़ी कह- लात घं । वे खास तंबू एक कनात के भीतर जो करीव १५० फुट लंबी और उससे ड्योढ़ी चौड़ी थी, लगाए जाते थे और उसमें जनाने तंबुओं तथा बैठक आदि के भिन्न भिन्न विभाग होते थे । में गर्मी से रक्षा के लिये खस का तंबू बताया जाता था ग्रीष्म ऋतु जिसे जल से छिड़क छिड़ककर तर रखते थे । उपर्युक्त कनात के

  • एक पादरी का पुत्र था और इसने ईटन में विद्याध्ययन किया था ।

ई० स०१७६५ में जब इसकी अवस्था १७ या से भारतवर्ष में थायां और बंगाल की सेना में वर्ष पीछे जब अँगरेजों ने दक्षिण से सरिया यह भी वहीं था । वर्ष की थी, यह इंग्लैंड नियुक्त किया गया । 您 पर घेरा डाला उस अवसर पर लोगों को दिए जाने के पूर्व जावा द्वीप का यह कुछ समय के लिये शासक रहा था । ० ० १८२६ में यह कर्नल बना और वर्ष पश्चात् राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासलेखक कर्नल टाड के, जो इसका मित्र था, स्वर्गवासी होने के दो दिन पश्चात् यह भी दिल हो गया ।