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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२८

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! ( ११ ) इस समय मनोरंजन पुस्तकमाला, हिंदी वैज्ञानिक कोष और हिंदी शब्दसागर आदि कार्यों का, जिनका परिचय ऊपर दिया जा चुका है. यहां निर्देश करने की आवश्यकता नहीं । १८०८ में आपने 'हिंदी कोविदरत्नमाला प्रथम भाग और १९१३ में दूसरा भाग लिखा । इन दोनों भागों में उन पर हिंदी- साहित्यसेवियों के सचित्र चरित दिए गए हैं, जिन्होंने इस ओर प्रयत्न किया है । १८१० में आपने एक और महत्त्वपूर्ण संस्था की ओर ध्यान दिया । आपने बनारस में हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन की आयोजना की । तत्र से सम्मेलन ने बहुत अधिक उन्नति की । घन तक भारत के भिन्न भिन्न भागों में इसके १८ अधिवेशन हो चुके हैं। १६०८ में आप बनारस छोड़कर काश्मीर चले गए, परंतु तीन साल के बाद वापस आ गए और १८९३ में कालीचरण हाईस्कूल ( लखनऊ ) में हेडमास्टर के पद पर नियुक्त हुए। आपके निरी- च में इस स्कूल ने बहुत उन्नति की । सन् १९१४ में आपकी हिंदी की सेवाओं को देखकर गुरुकुल कांगड़ी में होनेवाले आर्यभाषा- सम्मेलन का आपको अध्यक्ष बनाया गया और सन् १९१५ में आप प्रयाग के अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति हुए । दोनों पिछले आठ सालों से आप हिंदू यूनिवर्सिटी में हिंदी के प्रधान अध्यापक तथा उस विभाग के अध्यक्ष का काम कर रहे हैं। इस समय में आपने उच्च कक्षा के विद्यार्थियों के लिये साहित्यालोचन और भाषाविज्ञान नामक ग्रंथ लिखे जो बहुत उत्कृष्ट हैं ग्रंथ अपने अपने विषय से पहले ग्रंथ है। साहित्यालोचन ने दि में गंभीर साहित्यिक आलोचना की जन्म दिया है। अव यह कई विश्वविद्यालयों में बी० ए०, एम० ए० को कक्षाओं में पढ़ाया जाता है | } भाषाविज्ञान भारत की इंडो-प्रार्यन वर्नाक्यूलर भाषाओं एवं विशेषत: हिंदी के भाषाशास्त्र ( Philology) पर अत्यंत प्रामाणिक पुस्तक है। यह ग्रंथ भी कई विश्वविद्यालयों में एम० ए० में पढ़ाया