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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२८०

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श्री शिवदत्त शर्मा २३७ की दुकानों में महुए की दारू भी मिल जाती थी। पशुओं को मक्खी मच्छरों से बचाने के लिये तंबुओं के निकट व्यावश्यकतानुसार धुआं किया जाता था । जब यह ज्ञात हो जाता कि सेना को एक ही स्थान पर अधिक समय तक रहना है तब यदि घास और वृक्ष समीपवर्ती भूमि में होते तो लोग वहीं छोटे छोटे कपड़े भी बना लेते थे । सिंधिया महाराज की सेना ई० स० १८०७ में राहत- गढ़ के दुर्ग के सामने ७ मास तक पड़ी रही । वहाँ बहुत से झोपड़े बना लिए गए थे और शिविर का दृश्य ऐसा प्रतीत होता था कि मानों वह एक लंबा चौड़ा ग्राम हो ! उस अवसर पर प्रस्थान के समय महाराज के सामान को ले चलने में पल्लादार का काम देनेवाली एक सेना थी जो शोहदे नाम से प्रसिद्ध श्री । वह फजलखां नाम के अफसर के अधीन थी धेरा डालने के समय वही सेना खाई खादती, तापें जमाती और किले पर चढ़ने के रस्से, सीढ़ियां आदि ले जाया करती थी । साथ के सेवकों तथा अन्य गरीब लोगों की स्त्रियां सारी छावनी के लिये चक्की द्वारा आटा पीसकर देती थी और इस काम के लिये उन्हें वेतन मिलता था । साथ में चारवाले होते थे जो बैलों और खच्चरों पर घास लाते थे । इन लोगों की खेतवालों से बहुधा लड़ाइयां हो जाया करती थीं और रुष्ट हुए खेतवाले अवसर पाकर सेना के पशुओं को चुरा ले जाया करते थे । इस शिविर के साथ कई रिसाले थे जिनमें से एक बारह भाई- वाला कहलाता था। प्रारंभ में इस रिसाले के इसलिये उसका नाम बारह भाई पड़ गया था । १२ भाई नायक थे उसमें केवल मर- हठे ही नियुक्त थे। उस रिसाले में नियुक्त पुरुष पिंडारों के समान बड़े दुराचारी और फसादी थे। एक बार वेतन मिलने में विलंब हो जाने से रुष्ट होकर ये लोग भाग गए और कई मास पश्चात् वापस आए । इस समय में ये लूट मार से अपना निर्वाह करते रहे। लौटने पर जब फिर नियम से नहीं रह सके तब महा-