२४० मरहठा शिविर उनके शरीर पर एक पीला रेशमी चोगा था जो अलकलीक कह- लाता था और कंधों पर दुशाला था । गले में बहुमूल्य हीरे पन्ने और मोतियों की लड़ियाँ थीं। इन महाराज के पास कीमती मोती बहुत थे यहाँ तक कि इनका नाम ही मोतीवाला पड़ चुका था । गद्दो के दाएँ बाएँ सरदार लोग विद्यमान थे । महाराज स्वयं बार बार नहीं बोलते थे । कुत्र बड़े सरदार, जो समीप में बैठे थे, उनसे निवेदन कर देते और महाराज की आज्ञा प्राप्त कर लेते थे । रेजिडेंट को बैठने का स्थान महाराज की बाई और मिला और सामने ही पंडित श्रात्माराम, जे महाराज की तरफ से रेजिडेंट के यहाँ रहता था, बैठा į चलते समय अतर और पान दिए गए और गोपालराव, जो पहले रेजिडेंट साहब के स्वागत के लिये द्वार पर आया था, उन्हें वापस वहीं पहुँचाकर लौट आया । जब महाराज किसी से मिलने जाया करते तो अपनी मसनव ( गद्दी ) वहां पहले से भेज दिया करते थे और वहाँ पर प्रायः सब बातें वैसी ही होतीं जैसे अपने दर्जार में हुआ करती थीं । हाँ, पान इतर देने का काम उस निमंत्रक का होता था । विशेष अवसरों पर खिलयत दी जाती थी । खिलअत देने में "मरनेवाली बलिया वामन के सिर' वाली कहावत खूब चरितार्थ हुआ करती थी। हाथी, लँगड़े घोड़े आदि को भेट में दे उनसे पीछा छुड़ाने की यह अच्छी रीति थी, परंतु लेनेवाले लेते समय हुजत करने से भी नहीं चूकते थे। एक बार रेजिडेंट साहब को महाराज की तरफ से जियाफत दी गई। सायंकाल का समय था । डेरा में मेवा मिष्टान्न, पकान्न प्रादि का अच्छा ठाठ बाद लगाया गया । महाराज की तरफ से एक थैली, जिसमें एक हजार रुपए थे, भेट कीगई और रेजिडेंट साहब ने उस सरदार को, जो थैली लाया था, खिलअत दी । फिर रेजिडेंट ने गवर्नर-जनरल की ओर से चार सुंदर अरबी घोड़ों सहित एक सुंदर बग्गी, जिसमें सोने का काम हो रहा था, महाराज के भेंट की ।
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