श्री शिवदत्त शर्मा २४१ शेर के शिकार और हाथियों की लड़ाई का महाराज का बहुत शौक था। वे विशेष रूप से सर्दी में मृगया के लिये पधारा करते थे । छावनी में रहते हुए भी वे इन दोनों कामों में बहुत आसक्त रहते थे। ऐसे अवसरों पर उनके साथ बड़े अच्छे अच्छे दखनी घोड़ो पर सवार साथ रहा करते थे । अच्छे दखनी घोड़े की कीमत तीन चार हजार रुपए तक होती थो और मरहठा लोगों को इन सुंदर बहुमूल्य जानवरों पर इतना स्नेह था कि वे इनको गेहूँ की रोटी, चावल, शर्करा, घृत आदि खाने को देते । शिकार के समय महा- राज हरिण के चमड़े की पोशाक पहनते और तोड़ेदार बंदूक से शिकार करते थे। शिकार के अवसर पर वे एक बैल, जो इस विषय में शिक्षा दिया हुआ होता था, साथ रखते और उसके पीछे बैठकर वे निश्चय- पूर्वक हरिणों के झुंडों पर निशाना लगा सकते थे । उस समय शिविर में रहनेवाले हिंदू और मुसलमान अपने जीवन को उसी आराम के साथ बिताते थे जैसे घर में रहनेवाले । महाराज की ओर से सब त्योहार यथाविधि मनाए जाते थे ! संक्रांति के अवसर पर महाराज ने मुख्य मुख्य सरदारों को तथा रेजिडेंट को तिल भेट किए। उसी अवसर पर छावनी के एक धनाढ्य वैश्य ने बहुत से ब्राह्मणों को भोजन का निमंत्रण दिया और खान-पान का प्रशंसनीय प्रबंध किया ! जिमाने के पश्चात् प्रत्येक को एक धोती, कंबल और रूई की सदरी भेंट की! तदनंतर वसंत महोत्सव पर परस्पर पुष्प भेट किए जो बसंती रंग की पगड़ियों में लगाए गए । छावनी में स्थान स्थान पर नाच गान हुआ । मुसलमानों के मोहर्रम के अवसर पर महाराज दौलतराव ने दर- बार के समय हरे वस्त्र पहने और वे छावनी के लाजियों को, जिनकी संख्या सौ से अधिक घी, देखने गए। ठंडे होने के पूर्व रात्रि को सब ताजिए जुलूस के साथ महाराज के तंबू के सामने लाए गए और महारानी ने भी चिक में होकर उन्हें तथा पटेबाजी आदि को देखा । ब्राटन साहब भी हिंदुस्थानी पोशाक पहनकर रेजिडेंट के ३१
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