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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२९०

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श्री शिवदत्त शर्मा २४७ | दिया कि १ वर्ष तक कोई सेना उनकी भूमि पर नहीं श्रावेगी | इस समय जयपुर के महाराज जगत् सिंह सदाचारी नरेश नहीं थे उनका प्रेम एक साधारण वेश्या से, जिसका नाम "रसकपूर" रख दिया गया था, इतना बढ़ गया था कि उन्होंने उसके नाम एक जागीर निकाल दी, बहुत सजा हुआ महल बनवाकर उसे दिया और हाथी पर उसे अपने पीछे चैौरी करते हुए निकाला । इस निंदनीय कर्म से भाई बेटे उनसे बहुत अप्रसन्न हो गए थे । इसी का दुष्परिणाम था कि सामर्थ्य रखते हुए भी जयपुर रियासत की अपकर्ष प्राप्त हुआ । मरहठों ने जयपुर के वकील को बहुत दिनों तक अपने पास रखा और जयपुर से रुपया या चुकने पर उसे जाने दिया । महाराज सिंधिया के शिविर का प्रबंध अन्य सब बातों में अच्छा होने पर भी सिपाहियों को वेतन बहुधा समय पर नहीं मिलता था यहाँ तक कि अफसर लोगों को, अपनी सेना की संतुष्ट करने के लिये, ड्योढ़ी पर धरना देना पड़ता था। इस त्रुटि से सैनिक व्यवस्था कभी कभी शिथिल हो जाया करती थी ।