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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२९२

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( १२ ) उच्चारण [. लेखक --- श्री केशवप्रसाद मिश्र ] यदि मनुष्य में विवक्षित शब्दों के उच्चारण की शक्ति न होती तो वह निरा पशु ही रहता ! न उसका ज्ञान ही बढ़ता और न उसकी मनुष्यता ही किसी काम की होती । न कोई भाषा रहती न कोई साहित्य | न लंदों का अवतार होता न गानविद्या की सृष्टि । सभी की " अंतर्गुडगुडाय बहिर्न निःसरति" वाली दशा हो जाती । संकेतों और इंगित से, अक्षिनिकोच अथवा पाणिविहार से, कुछ साधारण प्राकृत भाव भने ही व्यक्त कर लिए जाते, पर प्रतिभा में प्रतिबिंबित, हृदय में जागरित असाधारण भाव जहाँ के तहाँ विलीन हो जाते। विधाता की सारी कारीगरी मिट्टी हो जाती । । अतः अभिलपनशक्ति को ईश्वर दत्त एक वर समझना चाहिए । सबका उच्चारण एक सा नहीं होता । बोली भी एक सी नहीं होती। उसके दशाश्रित, जात्याश्रित भेद तो होते ही हैं, ग्रामाश्रित और व्यक्ताश्रित भी होते हैं । सब श्रवधवासियों की बोली अवधी है सही पर वहाँ के ठाकुरों की बोली में जो उसक होगी उसका उनके परिजनों की बोली में सर्वथा अभाव पाया जायगा । किसी के आने पर अयोध्या प्रांत का निवासी जहाँ "के हैं ?" वहां हमारे बैसवाड़ी भाई गरजकर बोलेंगे -" को आय ?" हमारे देखते देखते 'वाजपेयी जी' को मजूरों ने 'बाँस बेइल, महराज' बना डाला । संस्कृत नवक बहुत दिनों तक तो नाखा था और 'नोखे की नाइन बांस की नहरन' में अब तक दिखाई पड़ जाता है; पर डंगा,

  • अंतरेण खल्वपि शब्दप्रयोग बहवोऽर्धा गम्यते अक्षिनिकाचैः पाणि-

विहारैश्च । महाभाष्य-२ । १ । १ । अर्थात आँख मटकाने और हाथ हिलाने से, बिना शब्दप्रयोग के ही, बहुत से भाव गट किए जा सकते हैं ।" ३२