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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/२९४

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श्री केशवप्रसाद मिश्र २५१ से फ़रियाद करने लगीं - - ब्रह्मन् में आपको इत्तला देती हूँ, आप मेरा इस्तीफा ले लीजिए । या तो बंगाली गाथा ( प्राकृत कविता ) पढ़ना छोड़ दें या कोई दूसरी सरस्वती बनाई जाय ?* बंगाली ब्राह्मणों का पढ़ना न अतिस्पष्ट होता है न श्लिष्ट । न उसे रूक्ष कह सकते हैं न श्रतिकोमल । न गंभीर ही न अतितीत्र ही । न गुड़ मीठा न गुड़ तीता । चाहे कोई रस, रीति वा गुण हो जब पढ़ेंगे तब गर्व से अंत में टंकारा अवश्य देंगे 1 गये, पद्य मिश्र कैसा ही काव्य हो द्रविड़ कवि गाकर ही पढ़ेगा। संस्कृत के शत्रु लाट ( गुजराती ) प्राकृत बड़ी लटक से पढ़ते हैं क्योंकि ललित आलाप करते करते उनकी जिह्वा पर सौंदर्य की मुहर सी लगी होती है सुराष्ट्र ( सोरठ-- गुजरात काठियावाड़ ) और त्रवण ( पश्चिमी राजपुताना ) आदि के लोग बहुत ही अच्छी तरह संस्कृत में भी अपभ्रंश का पुट दे देकर पढ़ते हैं । शारदा के प्रसाद से काश्मीरी सुकवि तो होते हैं, पर उनका पढ़ना कानों में गुर्च की पिचकारी देना है। उत्तरापथ के कवि, चाहे कैसे ही सुसंस्कृत क्यों न हों, जब पढ़ेंगे तब नाकी देकर । जिसमें प्रत्येक ध्वनि ठिकाने की होती है, वर्ण स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं, यतियों का विभाग रहता है, वह पांचाल ( रुहेलखंड ) के कवियों का गुणनिधि तथा सुंदर पाठ कानों में मानों शहद बरसाता है । उसका कहना ही क्या ! लकारों की लड़ी और रेफों की फर्राट के साथ ऐंठ ऐंठकर बोलना शोहदों का अच्छा लगता है, भव्य काव्यक्षों का नहीं । । इस प्रकार दो बातें विदित होती हैं । एक यह कि कंठ तालु आदि उच्चारण-स्थानों की समानता होते हुए भी सबके उध्धारण अथवा पाठक्रम एक से नहीं होते और दूसरी यह कि भाषा में परि- X

  • × × × × × × × × × 1 ब्रह्मन् विज्ञापयामि त्वां स्वाधिकार-

जिहासया । गौडस्त्यजतु वा गाथामन्या वास्तु सरस्वती ॥ x x x + लल्ल्लकारया जिल्हा' जर्जरस्फाररेफया | गिरा भुजगाः पूज्यन्ते काव्य- भव्यधियो न तु ॥ काव्यमीमांसा । ७ ।