२५४ उच्चारग चपत खाता था । हाँ, प्रसंगात् एक बात याद आ गई ! काश्मीर के राजा जयापीड के महामंत्री दामोदर गुप्त (सं० ८११-८४२ वै०) ने काशी के तत्कालीन वेदाध्यापकों की एक अच्छी मीठी चुटकी ली है। उन्होंने लिखा है कि काशी में नूपुरों की ऐसी कंकार होती है कि वेदाध्यापक शिष्यों की अशुद्धियाँ सुन नहीं पाते। | चलिए बेचारे विद्यार्थी चपत खाने से बचे ! उच्चारण में ग्रशक्ति और प्रमाद के कारण ही परम पावन वैदिक भाषा बिगड़ते बिगड़ते आज क्या की क्या हो गई । भर्तृहरि न निर्गुण वक्ताओं को कोसते हुए देववाणो की इस दुर्दशा पर गरम आँसू बहाए हैं। । शक का छिलका या विकता वल्मीक का बांबी या त्रिमीट, मनीषा कामंशा, विद्युत् का बैजा, अविश्वात्य का अहिवात, तोक का खोका (बं) दुर्गा (वै० ) का डेरा, सपर्य (वै० पूजा करना) का सपना ( ० नहाना ), पराके (वै० दूर ) का फरके ( पूर्वी अलग ), पृष्ठ का विड़िया और संज्ञा का सान आदि किसने किया? वैदिक भाषा अति प्राचीन है। बहुत से परि- वर्तन भुगत चुकी है। उसे छोड़िए । अभो कल की आई अँगरेजी इस प्रकार बदल चली है कि बड़े बड़े विज्ञान मूलान्वेषण में गाते खा जाते हैं । 'लिबड़ी बरताना' लेकर भागे, सब बोलते हैं, पर यह नहीं जानते कि यह लिवड़ी बरताना Livery Baton का बेटा है | यदि उच्चारण को भ्रष्टता रोकने के उपाय न होते रहें तो कोई भाषा अपनी पूर्ण आयु न भोग सके । बीच ही में लोग उसका अंगभंग कर डालें । जिस भाषा में असवर्ण-संयोग अधिक होगा उदारो कव्येऽनुदात्त' करोति खण्डिकोपा- ध्यायस्तस्मै चपेटां ददाति श्रन्यत्वं करोमीति । वृद्धिरादैच 1915 का भाय । यत्र च रमणीभूपसरवयधिश्तिसकलदिङ नभोभागे । क एवं हि दृश्यते जो शिष्याणामाचार्यै नविद्यं वार्यते पटताम् ॥ कुट्टनीमल| ८ | + पारम्पर्यादपभ्रंशा निवभिधातुषु । प्रसिद्धिमागताः x x x x वाक्यपदीय ।। १५५ . देवी वागू व्यवकीर्णेयमशकैरभिधातृभिः x x x x x वही । १२६ ।
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