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पृष्ठ:कोशोत्सव-स्मारक-संग्रह.pdf/३०२

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( १३ ) कविराज़ धोयी और उनका पवनदूत [ लेखक श्री बलदेव उपाध्याय एम० ए० ] कौन ऐसा संस्कृतज्ञ होगा जिसने कालिदास के मेघदूत का नाम न सुना हो । शब्दों की सुंदर योजना, अर्थों की मनोरम कल्पना तथा मानवीय भावों का सरस चित्रण, इन उपक्रम सब दृष्टियों से महाकवि कालिदास की अमर कृतियों में यह खंडकाव्य अत्यंत मधुर तथा रमणीय समझा जाता है 1 प्राचीन काल में इस काव्य की बड़ी प्रसिद्धि थी । होता है । बहुत से कालिदास के इतना भाया, इसने उनके शैली का अनु- इन काव्यों की लोग संस्कृत साहित्य भर में इसे ही अपनी रुचि के अनुसार प्रधान स्थान दिया करते थे, जैसा कि 'माघे गतं वयः इस प्रसिद्ध आलोचनात्मक वाक्य से स्पष्टतया ज्ञात अनंतर होनेवाले कवियों की यह काव्य हृदय में ऐसा घर कर लिया कि उसके विपय तथा सरण अनेक प्रसिद्ध परवर्ती कवियों ने किया है । 'दूत-काव्य' अथवा 'संदेश काव्य' नाम दिया गया है, क्योंकि कालि- दास की इस अमर कृति के अनुरूप इन सब लोगों ने इन काव्यों में वायु, हंस, चातक, कोकिल आदि निर्जीव तथा सजीव वस्तुओं के द्वारा किसी प्रियतम के पास संदसा भिजवाया है । मैंदेसा भज- वाने के कारण इस काव्यसमूह का नाम 'संदेश काव्य' पड़ गया है । संस्कृत साहित्य का यह काव्यसमूह अपना एक विशेष आदरणीय स्थान रखता है । इन 'संदेश काव्य' में, जहाँ तक इतिहास से अव तक पता चलता है, सबसे पहला स्थान 'पवनदूत' को दिया जाता हैं । आज हम इसी सुंदर 'पचनदूत' तथा इसके रचयिता कविराज धायी के विषय में संक्षेप में कुछ निवेदन करना चाहते हैं । सबसे पहले महामहोपाध्याय पंडित हरप्रसाद शास्त्री ने अपनी संस्कृत हस्तलिखित पुस्तकों की रिपोर्ट की पहली जिल्द में 'पवनदूत'