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२७० कविराज्ञ धोयी और उनका पवनदूत कविराज धोथी के काव्य का यही संचित परिचय है। इस संक्षिप्त वर्णन से ही पाठक धोथी की मनोरम काव्य- कला का परि- चय पा चुके होंगे। अंत में इस सरस दूतकाव्य के सर्वत्र प्रचार तथा मंगलमय दीर्घ जीवन के लिये धीयो के ही शब्दों में श्राशा रखते हुए यह लेख समाप्त किया जाता यावच्छे भुर्वेति गिरिजासंविभक्तं शरीरं यावज्जैत्रं कलयति धनुः कौसुमं पुष्पकेतुः । । यावदाधारमय तरुयी केलिसाची कदंब- स्वावजीयात कविनरपतेरेव वाचां विलासः ||